मल्टी कैप फण्ड क्या है | क्या आपको निवेश करना चाहिए | Multi Cap Funds in Hindi

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क्या मल्टी कैप फण्ड , लार्ज कैप फण्ड से बेहतर वेल्थ बनाने वाले फण्ड होते है ? क्या आपको multi cap funds में इन्वेस्ट करना चाहिए ? मल्टी कैप फण्ड में आपको कितने समय के लिए इन्वेस्ट करना चाहिए ?

Multi Cap Funds in Hindi

Multi-Cap Funds क्या है?

Multi Cap Funds एक डायवर्सिफाइड इक्विटी म्यूच्यूअल होता है मतलब Multi Cap Funds का पैसा मार्केट कैप के आधार पर लार्ज कैप, मिडकैप व स्मालकैप कंपनियों में लगाया जाता है |  

मल्टी कैप फण्ड का पोर्टफोलियों बहुत ज्यादा डायवर्सिफाइड होता है क्योकि यह अलग-अलग सेक्टर के लार्ज, मीडियम व स्माल कैप स्टॉक्स से मिलकर बनती है | इसमें SEBI ( Securities and Exchange Board of India) के नियम के तहत 65% पैसा इक्विटी व इक्विटी से रिलेटेड अन्य इंस्ट्रूमेंट में लगाना अनिवार्य है |

Multi Cap Funds एक इक्विटी फण्ड है और इन स्कीम्स में डायनामिक इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी को अपनाया जाता है इसलिए निवेशकों को किसी भी इक्विटी से जुड़े स्कीम्स में निवेश करने का लक्ष्य 5-10 वर्ष का रखना चाहिए |

Multi Cap Funds के फायदे

Multi Cap Funds, फण्ड मैनेजर को अपने होल्डिंग्स को लार्ग कैप, मिड कैप व स्माल कैप कंपनियों में शेयर बाजार के आउटलुक के आधार पर बदलने का लचीलापन देती है  अर्थात जब मिडकैप व स्मालकैप कंपनियों का वैल्यूएशन महंगा होने लगता है तब फण्ड मैनेजर लार्ज कैप स्टॉक्स में जा सकते है |

इसके विपरीत जब लार्ज कैप स्टॉक्स का वैल्यूएशन महंगा होने लगता है तो फण्ड मैनेजर मिडकैप व स्मालकैप स्टॉक्स में निवेश कर सकते है |

इस तरह से प्योर स्मालकैप व मिडकैप फण्ड की तुलना में Multi Cap Funds लम्बे समय में कम रिस्क वाला हो जाता है और निवेशकों को प्योर लार्ज कैप फण्ड से बेहतर रिटर्न देता है |

Multi Cap Funds ऐसे निवेशकों के लिए बेहतर है जो मीडियम रिस्क या बैलेंस्ड रिस्क लेने के साथ बाजार के उतार चढ़ाव को सहन कर सकते है और लॉन्ग टर्म के लिए निवेश करना चाहते है |

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क्या आप म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश कर औसत रिटर्न चाहते है लेकिन ज्यादा रिस्क नही लेना चाहते है ? तो चलिए आज लार्ज कैप म्यूच्यूअल फण्ड के बारे में जानते है जो आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है |

Large Cap Mutual Funds in Hindi

Large Cap Mutual Funds क्या है ?

लार्ज कैप फण्ड, इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड का एक प्रकार है | इसमें निवेश किया गया पैसा मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर बड़ी कंपनियों के शेयर्स में लगाये जाते है |

Large Cap Mutual Funds लॉन्ग टर्म में बेहतर रिटर्न दे सकते है और यह म्यूच्यूअल फण्ड में पहली बार निवेश करने लोगों के लिए अच्छा माना जाता है क्योकि लॉन्ग टर्म फण्ड ज्यादा अस्थिर नही होते है और लगातार निवेशकों को एक औसत रिटर्न देते रहते है |

लार्ज कैप फण्ड का 75% से 80% पैसा स्टॉक मार्केट के बड़ी कंपनियों  (मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर ) में लगाया जता है | और शेष 20% से 25% पैसा स्मालकैप व मिडकैप कंपनियों में लगाया जाता है ताकि इन्वेस्टर का रिस्क कम करने के बाद बेहतर रिटर्न भी दिया जा सकें |

Large Cap Mutual Funds क्यों है फायदेमंद

Large Cap Mutual Funds में ज्यादा रिस्क नही होता है क्योकि इसका पैसा लार्ज कैप कंपनीज में निवेश होता है | लार्ज कैप कंपनियां आर्थिक रूप से मजबूत, अच्छे ब्रांड, व ग्राहकों को बेहतर वैल्यू देती है इसलिए इसमें भरोसा भी किया जाता है |

लार्ग कैप कंपनिया लम्बे समय से व्यापार कर रही होता है इसलिए ऐसी कंपनियां कई तेजी व मंदी के समय को देखी रहती है और उन हालातो को अच्छे से हैंडल भी कर सकती है | इसके साथ ही लार्ज कैप कंपनियों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस भी अच्छे से लागू होता है जिसका फायदा लार्ज कैप फण्ड में देखने को मिलता है |

Large Cap Mutual Funds लॉन्ग टर्म में सम्पत्ति बनाने में मदद करती है लेकिन इसके साथ ही शोर्ट टर्म में यह रेगुलर डिविडेंड भी देती है व इसमें रिस्क कम होने से Large Cap Mutual Funds सोने पर सुहागा हो जाता है |

Large Cap Mutual Funds शुरुआत में ज्यादा बेहतर रिटर्न नही दिखाती है लेकिन समय के साथ इसका रिटर्न भी धीरे-धीरे बढ़ते जाता है |


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क्या Small Cap Mutual Funds में ज्यादा रिटर्न मिलता है ? क्या आप जानना चाहते है कि स्माल कैप फण्ड में क्या खास है ? तो चलिए जानते है कि स्माल कैप फण्ड आखिर क्या है और क्या है खास?

Small Cap Mutual Funds in Hindi

Small Cap Mutual Funds क्या है ?

वे फण्ड जो मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर छोटे कंपनियों में निवेश करते है, स्मालकैप Mutual Fund कहते है | स्माल कैप वह छोटे कम्पनियां होते है जो अपने डेवलपमेंट के चरण में होते है |

स्मालकैप फण्ड में रिस्क लार्ज कैप फण्ड की तुलना में अधिक होता है क्योकिं स्मालकैप फण्ड का पैसा स्टार्टअप या शुरुआत में कम कमाई करने वाले बिज़नस में लगाया जाता है |

स्मालकैप कंपनियां अपने डेवलपमेंट फेज में होती है इसलिए ऐसे कंपनियों में पैसा लगाने से स्मालकैप फण्ड के निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलता है | लेकिन स्मालकैप कंपनियां स्थायी नही होती है और न ही लार्ज कैप कंपनियों की तरह सफल होती है इसलिए इसमें (स्मालकैप फण्ड ) निवेश करने से रिस्क भी बहुत ज्यादा होता है |

स्मालकैप फण्ड उन निवेशकों के लिए बेहतर हो सकती है जो ज्यादा रिस्क लेने की क्षमता रखने के साथ-साथ लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्ट करना चाहते है क्योकि लम्बें समय में स्मालकैप Mutual Fund, मिड कैप व लार्ज कैप से ज्यादा रिटर्न दे सकता है |

स्मालकैप फण्ड शोर्ट टर्म में अच्छा रिटर्न नही देते है क्योकिं स्मालकैप कम्पनीयों में उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है और यह केवल निवेशकों के रिस्क को बढ़ाता है |

इसके अतिरिक्त बुल मार्केट के समय में स्मालकैप फण्ड का रिटर्न, मिड कैप व लार्ज कैप फण्ड से भी ज्यादा हो सकता है | जबकि बेयर मार्केट के समय में स्मालकैप फण्ड से निवेशकों को घाटा भी मिड कैप व लार्ज कैप से भी ज्यादा हो सकता है |

Small Cap Mutual Funds में निवेश से पहले क्या याद रखें ?

Small Cap Mutual Funds में निवेश करने से निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलता है लेकिन इसमें रिस्क भी बहुत ज्यादा होता है इसलिए निवेश से पहले स्मालकैप फण्ड का अच्छे से एनालिसिस करें और अगर आप रिस्क ले सकते है तब ही स्मालकैप फण्ड में निवेश करें अन्यथा न करें |
  • Small Cap Mutual Funds के रिस्क को कम करने के लिए अपने पोर्टफोलियो को डाईवर्सिफाई करे व फण्ड का रिसर्च करने में ज्यादा समय दे |
  • लम्बें समय के लिए निवेश करें ताकि बाजार के अस्थिरता से बच सकें |
  • बाजार की अस्थिरता से बचने के लिए फण्ड में सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिये भी निवेश कर सकते है |
  • अस्थायी कारणों से व बाजार के शोर्ट टर्म लाभ या हानि के कारण ही फण्ड की खरीदी-बिक्री न करें | 
  • मार्केट को टाइम करने व अनुमान लगाने की भूल कभी न करें |
  • स्मालकैप Mutual funds शोर्ट टर्म में बहुत अस्थिर रिटर्न देते है इसलिए लम्बे समय ( 5 साल से अधिक) के लक्ष्य के साथ निवेश करें |
  • स्मालकैप फण्ड में निवेश करने से पहले फण्ड के खर्च (एक्सपेंस रेश्यो ) को अवश्य जाँच करें |

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हाइब्रिड फण्ड क्या है | हाइब्रिड फण्ड के प्रकार | Hybrid Mutual Funds in Hindi

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जब आप म्यूच्यूअल फण्ड में इन्वेस्ट करते है तो क्या आपके मन में भी सवाल आता है कि आपको इक्विटी फण्ड मे इन्वेस्ट करना चाहिए या फिर डेट फण्ड में | तो चलिए आज समस्या का भी समाधान करते है और जानते है हाइब्रिड फण्ड के बारे में |
Hybrid Mutual Funds in Hindi

Hybrid Mutual Funds क्या है?

हाइब्रिड फण्ड, म्यूच्यूअल फण्ड निवेश का एक विकल्प है जो आपको डेट, इक्विटी व अन्य एसेट क्लास में निवेश करने की सुविधा देता है | इसमें न तो रिस्क ज्यादा होता है और न ही रिटर्न ज्यादा होता है मतलब हाइब्रिड फण्ड मीडियम रिस्क के साथ मीडियम रिटर्न देता है |

अगर आप इक्विटी फण्ड में निवेश करते है तो इसमें सही ज्ञान न होने से पैसे डूबने का जोखिम होता है व इसके साथ ज्यादा रिटर्न भी मिल सकता है जबकि डेट फण्ड में कम रिस्क होने के कारण रिटर्न भी कम होता है

हाइब्रिड म्यूच्यूअल फण्ड में इक्विटी व डेट दोनों एसेट में निवेश किया जाता है | इसका मतलब हाइब्रिड फण्ड डेट व इक्विटी एसेट का मिक्सचर होता है इसलिए hybrid mutual funds में इक्विटी फण्ड से कम रिस्क और डेट फण्ड से ज्यादा रिस्क होता है |

Hybrid Mutual Funds के प्रकार

इक्विटी या डेट में इन्वेस्ट करने के आधार पर हाइब्रिड फण्ड को कई केटेगरी में रखा गया है | ये केटेगरी म्यूच्यूअल फण्ड वर्गीकरण नॉर्म का अनुशरण करती है जो निम्नलिखित है |

Aggressive म्यूच्यूअल फण्ड - इसमें 15% से 35% फण्ड डेट इंस्ट्रूमेंट और शेष इक्विटी में निवेश किया जाता है इसलिए इस फण्ड में थोड़ा सा रिस्क होता है |

Balanced म्यूच्यूअल फण्ड - इस फण्ड में 40% से 60% के बीच का कॉम्बिनेशन रख कर लक्ष्य के आधार पर इक्विटी व डेट सिक्योरिटीज में निवेश किया जाता है |

Conservative म्यूच्यूअल फण्ड - इसमें केवल 10% से 25% पैसा ही इक्विटी में निवेश किया जाता है और शेष फण्ड डेट इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है ताकि निवेशकों का पैसा सुरक्षित रहे क्योकि इसमें बहुत ही कम रिस्क लेने वाले व्यक्ति निवेश करते है |

Dynamic एसेट एलोकेशन फण्ड - यह फण्ड फ्लेक्सिबल होता है मतलब किसी भी सिक्योरिटीज डेट या इक्विटी में निवेश करने का कोई फिक्स्ड स्ट्रक्चर नही होता है |

Equity सेविंग फंड्स - इस फण्ड का 65% भाग इक्विटी में लगाया जाता है और कम से कम 10% भाग डेट सिक्योरिटीज में एलोकेट किया जाता है |

Multi-एसेट एलोकेशन फण्ड - इस फण्ड में डेट, इक्विटी व अन्य एसेट क्लास में निवेश किया जाता है | इसमें सभी एसेट क्लास में कम से कम 10% एलोकेशन किया जाता है |

Arbitrage फण्ड - आर्बिट्राज फंड एक हाइब्रिड फण्ड होता है | इस फण्ड का 65% हिस्सा इक्विटी (कंपनियों के शेयर) या इक्विटी से जुड़े इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है | इसा फण्ड का पैसा इक्विटी में लगाये जाने के कारण रिस्क अधिक होता है इसलिए इसमें बेहतर रिटर्न मिलने की सम्भावना होता है |


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इक्विटी फण्ड क्या है | इक्विटी फण्ड के प्रकार | Equity Mutual Funds in Hindi

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म्यूच्यूअल फण्ड स्टॉक में इन्वेस्ट करने का इनडायरेक्ट तरीका होता है | इक्विटी फण्ड कई प्रकार के हो सकते है | तो चलिए इक्विटी फण्ड को पुरे डिटेल्स में जानते है | और ये कितनें तरह के होते है ?

Equity Mutual Funds in Hindi

Equity Funds क्या है ?

इक्विटी फण्ड, म्यूच्यूअल फण्ड का एक विकल्प है | इसमें इन्वेस्ट किया गया पैसा कंपनियों के शेयर में लगाया जाता है इसलिए इसे इक्विटी फण्ड कहते है | जब एक फण्ड का 65% या उससे अधिक पैसा शेयरों में निवेश किया जाता है तो उसे इक्विटी फण्ड कहा जाता है | इसके शेष 35% या कम राशि को डेट सिक्योरिटीज या इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है |

इक्विटी फण्ड लॉन्ग टर्म में बेहतर रिटर्न देता है लेकिन इसमें रिस्क भी होता है क्योकिं इस फण्ड का पैसा शेयर बाजार में ट्रैड होने वाले शेयरों में इन्वेस्ट किया जाता है | इक्विटी फण्ड आपको 14% - 15% का औसत रिटर्न दे सकती है |

Equity Funds के प्रकार

म्यूच्यूअल फण्ड अलग-अलग प्रकार के होते है क्योकिं कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन कम या ज्यादा होता है | और ये कंपनियां विभिन्न सेक्टर या इंडस्ट्री की हो सकती है |

इसके साथ ही फण्ड हाउस या एसेट मैनेजमेंट कंपनियों के स्टाइल के आधार पर भी म्यूच्यूअल फण्ड कई प्रकार के हो सकते है |

स्माल कैप, मिड कैप, लार्ज कैप या मल्टी कैप

यहाँ कैप का मतलब मार्केट कैपिटलाइजेशन है | शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियां मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर छोटी-बड़ी होती है |

इस प्रकार जो फण्ड ज्यादा मार्केट कैप वाले अच्छी कंपनियों में पैसा लगाती है उसे लार्ज कैप फण्ड कहते है | इसमें बाजार का उतार-चढाव थोड़ा कम होता है |

वहीं जो फण्ड मीडियम कैप व स्मालकैप वाले कंपनियों में पैसा लगाती है उसे क्रमशः मिड कैप व स्मालकैप फण्ड कहते है | इन फण्ड में बाज़ार के ऊपर-नीचें होने पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है |

सेक्टर फण्ड, डाइवर्सिफाइड फण्ड और थीमेटिक फण्ड

सेक्टर फण्ड का पैसा एक ही सेक्टर के कई कंपनियों में निवेश किया जाता है | जैसे आईटी, बैंकिंग, रिटेल, एग्रीकल्चर सेक्टर आदि | इसमें एक ही सेक्टर में इन्वेस्ट होने से निवेशक को जोखिम भी ज्यादा होता है |

जबकि डाइवर्सिफाइड फण्ड में लगाया पैसा अलग-अलग सेक्टर के कंपनियों में इन्वेस्ट किया जाता है इसलिए इसमें जोखिम सेक्टर फण्ड की तुलना में कम हो जाता है |

थीमेटिक फण्ड का पैसा एक थीम को फॉलो करके लगाया जाता है | जैसे स्टार्टअप आदि |

एक्टिव फण्ड और पैसिव फण्ड

ये फण्ड पूरी तरह से फण्ड हाउस व फण्ड मैनेजर के इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी पर निर्भर करता है | अगर फण्ड मैनेजर कंपनियों का एनालिसिस व रिसर्च करके उसे अपने पोर्टफोलियो में रखता है तो ऐसे फण्ड को एक्टिव फण्ड कहते है |

जबकि पैसिव फण्ड उसे कहते है जिसमे फण्ड मैनेजर इंडेक्स ( सेंसेक्स व निफ्टी आदि) के कंपनियों में निवेश करता है जिससे इसका रिटर्न भी इंडेक्स के समान ही आता है इसलिए इस फण्ड को इंडेक्स फण्ड भी कहते है|

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डेट फण्ड क्या है | डेट फण्ड के प्रकार | What are Debt Mutual Funds in Hindi

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क्या आप म्यूच्यूअल फण्ड में इन्वेस्ट करना चाहतें है लेकिन ज्यादा रिस्क लेने से डरते है ? अगर हाँ तो आप बिल्कुल सही पोस्ट पढ़ रहे है | आज के इस पोस्ट में आप डेट फण्ड के बारे में सीखने वाले है | तो चलिए जानतें है Debt Mutual funds क्या होता है |

Debt Mutual Funds in Hindi

Debt Mutual Funds क्या है ?

डेट फण्ड, म्यूच्यूअल फण्ड का एक विकल्प है | यह उन निवेशकों के लिए बेहतर है जो कम रिस्क लेकर अपनें पैसे को निवेश करना चाहते है | डेट फण्ड में निवेशकों के लगायें पैसे को सरकारी प्रतिभूतियों, कॉर्पोरेट बांड, ट्रेज़री बिल, व अन्य प्रकार के सिक्योरिटीज़ में लगाया जाता है अर्थात् उधार के रूप में संस्थाओ को दिया जाता है|

डेट फण्ड में इक्विटी फण्ड के तुलना में रिस्क कम होता है | इक्विटी फण्ड में पैसा कंपनियों के शेयर में लगाया जाता है इसलिए इक्विटी फण्ड में रिस्क ज्यादा होता है |

डेब्ट फण्ड में लगाया गया पैसा एक निश्चित समय के लिए, निश्चित ब्याज़ दर पर लगाया जाता है | अतः निवेशकों को इस बात का खबर रहता है कि समयावधि समाप्त होने पर उन्हें एक "फिक्स इनकम" मिलने वाला है | डेट फण्ड को फिक्स इनकम मिलने के वजह से ही फिक्स इनकम सिक्यूरिटी कहा जाता है |

डेट फण्ड में लगाया पैसा कम या ज्यादा समय के लिए अलग-अलग क्रेडिट रेटिंग्स की सिक्योरिटीज़ में भी लगाया जाता है ताकि निवेशकों को बेहतर रिटर्न दिलाया जा सकें, परंतु कई बार क्रेडिट रेटिंग्स के आधार पर इन सिक्योरिटीज़ में रिस्क भी होते है | जहां ज्यादा क्रेडिट रेटिंग वालें संस्थाओ अपना उधारी व ब्याज़ चुकाने में बेहतर मानी जाती है |

आप डेट फण्ड में कम समय (3 या 6 माह ) या लम्बे समय के (3 या 5 साल से अधिक ) के लिए इन्वेस्ट कर सकते है | समय ( मैच्योरिटी) के आधार पर डेट फण्ड भी अलग-अलग हो सकते है |

डेट फण्ड में 3 साल या उससे ज्यादा होने के बाद 20% का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगाया जाता है जबकि शोर्ट-टर्म में निवेशक को डेट फण्ड से मिलने वाले कैपिटल गेन को टोटल इनकम में जोड़कर सरकार द्वारा निर्धारित टैक्स स्लैब के आधार पर टैक्स देना होता है |

Debt Mutual Funds कैसे करता है ?

इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड कंपनियों के शेयर पर निर्भर होता है उसी प्रकार डेट म्यूच्यूअल फण्ड पूरी तरह से ब्याज़ दर पर निर्भर करता है |

ब्याज़ दर (रेपो रेट व रिवर्स रेपो ), जिसे रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) नियंत्रित करती है अर्थात RBI ही ब्याजदर को अर्थव्यवस्था के परिस्थितियों के आधार पर कम या ज्यादा करती है |

और इस ब्याजदर के उतार-चढाव के आधार पर ही कॉर्पोरेट बांड या डेट सिक्योरिटीज जारी करती है | इसका मतलब है कि डेट फण्ड का रिटर्न ब्याजदर पर निर्भर होता है |

अगर ब्याजदर कम होता है तो बांड की कीमत बढ़ जाती है और निवेशकों को अच्छा रिटर्न मिलता है जबकि ब्याजदर ज्यादा होता है तो बांड की कीमत घट जाती है | इसका मतलब डेट इंस्ट्रूमेंट का की कीमत ब्याजदर के विपरीत होता है |

Debt Mutual Fund के प्रकार

जिस तरह इक्विटी फण्ड, मार्केट कैप व इन्वेस्टिंग स्टाइल के आधार कई प्रकार के होते है उसी प्रकार डेट फण्ड मैच्योरिटी के समय के आधार पर कई प्रकार के होते है |

लिक्विड फण्ड - इस फण्ड का पैसा ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है जिन की मैच्योरिटी 91 दिन से ज्यादा नही होती है | यह फण्ड बचत बैंक की तुलना में अच्छा विकल्प होता है क्योकिं इसमें बेहतर रिटर्न मिलता है और कम समय के लिए होता है |

लिक्विड फण्ड का पैसा कम समय में मैच्योर होने वाले डेट इंस्ट्रूमेंट में लगया जाता है इसलिए इसमें रिस्क कम होता है व रिटर्न के नेगेटिव होने का चान्स बहुत ही कम होता है |

डायनामिक फण्ड - डायनामिक फण्ड में, निवेश में मिलने वाला ब्याज़ दर बदलता रहता है इसलिए निवेश के मैच्योर होने का समय भी बदलता रहता है अर्थात ब्याज दर से सीधा सम्बन्ध होने के कारण पैसे का निवेश भी जल्दी या देर से किया जाता है |

शोर्ट टर्म या अल्ट्रा शोर्ट टर्म डेट फण्ड - ये डेट फंड्स ऐसे इन्वेस्टर के लिए बहुत ही उपयुक्त है जो 3 साल के लिए निवेश करना चाहते है क्योकिं यह फण्ड 3 साल में मैच्योर हो जाते है | इसके साथ ही ब्याज़ दर में बदलाव का भी इन फंड्स में ज्यादा प्रभाव नही होता है |

इनकम फण्ड - इनकम फण्ड में मैच्योरिटी का समय कम से कम 5 औसतन होता है इसलिए इस फण्ड का पैसा ब्याज़ दर के आधार पर अलग-अलग सिक्योरिटीज़ में लगाया जाता है ताकि निवेशकों को बेहतर रिटर्न दिलाया जा सकें |

गिल्ट फण्ड - इस फण्ड का पैसा केवल सरकारी सिक्योरिटीज में इन्वेस्ट किया जाता है | गिल्ट फण्ड उन निवेशकों के लिए बेहतर माना जाता है जो कम रिस्क के साथ एक अच्छे विकल्प की तलाश में है | गिल्ट फण्ड में क्रेडिट रिस्क कम होता है क्योकिं गिल्ट फण्ड का पैसा सरकारी सिक्योरिटीज में लगाया जाता है |

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What is Inflation Meaning in Hindi:क्या मुद्रास्फीति के कारण दैनिक आवश्यकताओं की चीजें महंगी हो जाती है ? क्या मुद्रास्फीति का प्रभाव हम सब पर पड़ता है ? यदि हाँ तो मुद्रास्फीति या महंगाई से बचने के क्या तरीके है ? चलिए जानते है आखिर क्यों मुद्रास्फीति अच्छी नही होती है ?

What is Inflation Meaning in Hindi

मुद्रास्फीति या Inflation क्या है ?

मुद्रास्फीति एक ऐसी स्थिति है जिसमें जिस मुद्रा (रुपयें ) से आप सामान खरीदते है उसकी वैल्यू कम हो जाती है क्योकिं देश में ज्यादा मुद्रा (सिक्के व नोट की संख्या ) हो जाते है | और वस्तुओं (खानें-पीने, दैनिक उपयोग व अन्य सामान ) की कीमत बढ़ जाती है |

इस तरह से महंगाई (मुद्रास्फीति ) में रुपयें सभी के पास आ जाते है | जिसकी वजह से मुद्रा से खरीदनें की शक्ति कम हो जाती है और उपयोग की वस्तुयें कम हो जाती है जिससे वस्तुओं की कीमत आसमान छूने लगती है |

मुद्रास्फीति के समय भी देश में मुद्रा (रुपयें ) का चलन तो पहले जैसा ही होते रहता है लेकिन इस तरह मुद्रा की वैल्यू घटने पर भी प्रभाव दिखाई नही देता है |

इसका सबसे ज्यादा प्रभाव कम इनकम वाले एवं मध्यमवर्गीय परिवार पर होता है क्योकिं महंगाई बढ़ने के कारण ऐसे परिवार अपनी दैनिक उपयोग के वस्तुओं(खानें-पीने, दैनिक उपयोग के अन्य सामान ) को भी खरीद नही पाते है |

याद करिये आज से 10 साल पहले 100 रुपयें में आप बहुत सा सामान खरीद कर ले आते थे लेकिन आज 100 रुपयें में केवल एक या दो सामान ही मिलती है | इसकी मुख्य वजह मुद्रास्फीति (महंगाई) है |

उदाहरण: आज एक कुर्सी 100 रुपयें  में मिलता है और आप 100 रुपयें  बैंक में जमा करते है | एक साल बाद कुर्सी  की कीमत 106 (100 + 6 महंगाई) रुपयें हो जाती है लेकिन आपके बैंक में जमा 104 (100+ 4 ब्याज ) रुपयें होते है मतलब आपके 100 रुपयें में खरीदनें की शक्ति 2 प्रतिशत कम हो गयी है |

मुद्रास्फीति हर साल 5% - 6% की दर से बढ़ती है मतलब हर साल मुद्रा ( रूपये ) से खरीदनें की शक्ति 5-6 प्रतिशत कम होते जाती है इसलिए मुद्रा (रुपयें ) के खरीदनें की शक्ति को बढ़ाना जरुरी हो जाता है |

महंगाई या मुद्रास्फीति (inflation) से कैसे बचें?

मुद्रास्फीति या महंगाई से बचने का केवल एक ही तरीका है | इससे बचनें के लिए आपको मुद्रा (रुपयें) की वैल्यू को बढ़ाना है | मुद्रा (रुपयें) की वैल्यू बढ़ाने के लिए आपको मुद्रा (रुपयें) को सही से उपयोग में लाना है |
  • मुद्रा की बचत करना 
  • मुद्रा की बचत कर बैंक में न रखना क्योकिं बैंक में 4% ब्याज मिलता है जो महंगाई दर (6%) से कम है
  • बचत करने के बाद मुद्रा का निवेश करना ताकि महंगाई दर से ज्यादा का ब्याज ( रिटर्न ) मिल सके
नोट: निवेश का अर्थ = किसी ऐसे जगह में मुद्रा(रूपये) को लगाना जिसमें रिस्क या जोखिम कम हो और जिससे महंगाई दर (6%) से ज्यादा का ब्याज ( रिटर्न ) मिल सकें |

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क्या आप टैक्स बचाने के साथ-साथ अपने निवेश में अच्छा रिटर्न भी कमाना चाहते है ? और क्या यह संभव है ?तो चलिए जानतें है यह कैसे संभव है व ELSS क्या है और इसके क्या-क्या फायदे है ?
ELSS in Hindi

Equity Linked Savings Scheme या ELSS क्या है?

ईएलएलएस या इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम के नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ईएलएलएस एक टैक्स सेविंग स्कीम है | अर्थात् ईएलएलएस में पैसे लगाकर आप सेक्शन 80सी के तहत 1.5 लाख रुपयें तक के निवेश में टैक्स छूट का फायदा उठा सकतें है |

ईएलएलएस एक इक्विटी फण्ड होता है | अगर आप ELSS में पैसा लगाते है तो यह पैसा इनडायरेक्ट रूप से इक्विटी या शेयर में लगाया जाता है अर्थात् आप ईएलएलएस में पैसा लगाकर टैक्स में छुट व ज्यादा रिटर्न कमा सकतें है |

Equity Linked Savings Scheme में लगाया गया पैसा 3 साल के लिए लॉक हो जाता है मतलब ईएलएलएस का लॉक इन पीरियड 3 साल का होता है | ईएलएलएस ही एक ऐसा टैक्स सेविंग स्कीम है जिसका लॉक इन पीरियड अन्य टैक्स सेविंग स्कीम की तुलना में बहुत कम है |

पीपीएफ (पब्लिक प्रोविडेंट फण्ड ) का लॉक इन पीरियड 15 साल है, जबकि एफडी (फिक्स्ड डिपाजिट ) का 5 साल लॉक इन पीरियड है | जो ELSS के लॉक इन पीरियड से ज्यादा है | इसके साथ ही ELSS में रिटर्न भी अन्य स्कीमों की तुलना में बेहतर होता है |

यह लॉन्ग टर्म में इन्वेस्ट कर संपत्ति बनाने का बेहतर विकल्प कहा जा सकता है | इसके अतिरिक्त ईएलएलएस के निवेश से मिलने वाला रिटर्न 1 लाख रुपयें से ज्यादा होने पर 10% लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लिया जाता है |

क्या ELSS में निवेश करना सही है?

ईएलएलएस या इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में रिटर्न व रिस्क अधिक होता है क्योकिं इसमें इन्वेस्ट किया गया पैसा इक्विटी मतलब कंपनियों के शेयर में लगाया जाता है | अतः केवल टैक्स सेविंग के लिए ही ELSS में इन्वेस्ट न करें|

अगर आप स्टॉक या शेयर के उतार-चढ़ाव के रिस्क को संभाल सकते है तभी आपको ईएलएलएस में पैसे लगाने चाहिये, अन्यथा ELSS आपके लिए सही नही है |

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Exchange Traded Fund या ETF क्या है ?

एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड को अगर अलग-अलग समझते है तो एक्सचेंज का अर्थ स्टॉक एक्सचेंज, ट्रेडेड का अर्थ खरीदने-बेचने वाला, फण्ड मतलब बहुत से इन्वेस्टर्स का पैसा |

इस तरह से ETF या एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड का मतलब स्टॉक एक्सचेंज में हर दिन बाजार के निर्धारित समय में ख़रीदा व बेचा जाने वाला फण्ड है | ETF अलग-अलग सिक्योरिटीज़ ( शेयर, बांड, कमोडिटी, मुद्रा आदि) के आधार पर कई प्रकार के हो सकते है | इनमें से कुछ नीचें दिए गये है |

Exchange Traded Fund के प्रकार

गोल्ड ETF- गोल्ड ETF का प्राइस सोने के प्राइस पर बेस्ड होता है जब गोल्ड का प्राइस ऊपर जाता है तो गोल्ड ETF का प्राइस भी ऊपर जाता है और गोल्ड के दाम नीचें जाता है तो ETF का प्राइस भी नीचें चला जाता है |

करेंसी ETF- यह ETF आपको किसी देश के करेंसी को खरीदें बिना ही करेंसी मार्केट में भाग लेने का मौका देता है |

इंडेक्स फण्ड ETF- यह ETF एक पैसिव म्यूच्यूअल फण्ड की तरह होता है | जब कोई इन्वेस्टर इंडेक्स फण्ड या इंडेक्स फण्ड ETF खरीदता है तो वह इंडेक्स (सेंसेक्स, निफ्टी आदि ) के अंतर्गत आने वाले स्टॉक या शेयर के एक पोर्टफोलियो को खरीदता है |

ETF या Exchange Traded Fund के क्या फायदे है ?

  • इसका एक्सपेंस रेश्यो अन्य फण्ड की तुलना में कम होता है
  • यह मार्केट ओपन होने के बाद आसानी से ख़रीदा व बेचा जा सकता है 
  • यह डाइवर्सिफाइड होता है तो रिस्क भी कम हो जाता है
  • टैक्स लाभ के लिए भी ETF सही होता है
  • इसमें रिटर्न भी शेयर के इंडेक्स की तरह मिलता है

Exchange Traded Fund और Mutual Fund में अंतर

ETF व म्यूच्यूअल फण्ड दोनों में अंतर होता है | ETF के मूल्य में बदलाव रियल टाइम में होता है जबकि म्यूच्यूअल फण्ड NAV के मूल्य में परिवर्तन दिन के अंत में होता है |

ETF को म्यूच्यूअल फण्ड के एनएफओ की तरह ही एसेट मैनेजमेंट कम्पनी पेश करती है उसके बाद ETF शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिए लिस्ट किया जाता है |

एक निवेशक ETF को रियल टाइम मूल्य में खरीद-बेच सकता है मतलब ETF का ट्रेडिंग किया जा सकता है जबकि म्यूच्यूअल फण्ड में ट्रेडिंग संभव नही है |

ETF को खरीदनें- बेचने के लिए डीमैट अकाउंट होना जरुरी है पर म्यूच्यूअल फण्ड खरीदनें के लिए डीमैट अकाउंट होना जरुरी नही है |

इसके अतिरिक्त ETF में एक्सपेंस रेश्यो (फण्ड का खर्च ) भी म्यूच्यूअल फण्ड की तुलना में कम होता है |

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क्या है इंडेक्स फण्ड | क्या आपको निवेश करना चाहिए | Index Funds in Hindi

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म्यूच्यूअल फण्ड निवेश का बेहतर विकल्प है | बाजार में म्यूच्यूअल फण्ड के कई विकल्प निवेश करने के लिए उपलब्ध है | इंडेक्स फण्ड भी उन्ही विकल्पों में से एक है | पर इंडेक्स फण्ड के बारे में बहुत कम लोगों को पता होता है |
Index Funds in Hindi

Index Funds क्या है?

Index Fund एक इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड है | जैसा कि इसके नाम में इंडेक्स है इसका मतलब यह है कि इंडेक्स फण्ड में लगाया गया पैसा शेयर बाजार के इंडेक्स में लगाया जाता है |

Index fund एक पैसिव फण्ड होता है अर्थात इसमें अनुभवी फण्ड मैनेजरों के द्वारा शेयर नही चुना जाता है | बल्कि इंडेक्स के कंपनियों में निवेश किया जाता है |

भारतीय शेयर बाजार में दो मुख्य इंडेक्स सेंसेक्स व निफ्टी के साथ कई इंडेक्स है अतः इंडेक्स फण्ड का पैसा सेंसेक्स के 30 कंपनिया या निफ्टी के 50 कंपनियों में या अन्य सेक्टरों के इंडेक्स में लगाया जाता है |

इसके अतिरिक्त इंडेक्स फण्ड में एक्टिव फण्ड (जिसमे फण्ड मेनेजर की आवश्यकता होती है ) की तुलना में एक्सपेंस रेश्यो ( फण्ड का खर्च ) कम होता है |

भारत जैसे उभरते देशों में इंडेक्स फण्ड में निवेश कम किया जाता है क्योकिं भारत जैसे बाजारों में अच्छे शेयर चुनकर फायदा लिया जा सकता है | इसलिए ज्यादातर सलाहकार एक्टिव फण्ड को ही चुनने की सलाह देते है |

Index fund का सीधा सम्बन्ध स्टॉक मार्केट से होता है इसलिए शेयर बाजार के गिरने पर इंडेक्स फण्ड का रिटर्न कम हो जाता है | इंडेक्स फण्ड से लॉन्ग टर्म में 15% से 16% का एवेरज रिटर्न प्राप्त किया जा सकता है |

इंडेक्स फण्ड उन इन्वेस्टर के लिए अच्छा होता है जो शेयर में इन्वेस्ट करना चाहते है लेकिन शेयर बाजार को ट्रैक नही कर पाते है | इसलिए वे इंडेक्स फण्ड में लगाकर लॉन्ग टर्म के लिए छोड़ देते है |

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