Sep 22, 2019

इक्विटी फण्ड क्या है | इक्विटी फण्ड के प्रकार | Equity Mutual Funds in Hindi

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म्यूच्यूअल फण्ड स्टॉक में इन्वेस्ट करने का इनडायरेक्ट तरीका होता है | इक्विटी फण्ड कई प्रकार के हो सकते है | तो चलिए इक्विटी फण्ड को पुरे डिटेल्स में जानते है | और ये कितनें तरह के होते है ?

Equity Mutual Funds in Hindi

Equity Funds क्या है ?

इक्विटी फण्ड, म्यूच्यूअल फण्ड का एक विकल्प है | इसमें इन्वेस्ट किया गया पैसा कंपनियों के शेयर में लगाया जाता है इसलिए इसे इक्विटी फण्ड कहते है | जब एक फण्ड का 65% या उससे अधिक पैसा शेयरों में निवेश किया जाता है तो उसे इक्विटी फण्ड कहा जाता है | इसके शेष 35% या कम राशि को डेट सिक्योरिटीज या इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है |

इक्विटी फण्ड लॉन्ग टर्म में बेहतर रिटर्न देता है लेकिन इसमें रिस्क भी होता है क्योकिं इस फण्ड का पैसा शेयर बाजार में ट्रैड होने वाले शेयरों में इन्वेस्ट किया जाता है | इक्विटी फण्ड आपको 14% - 15% का औसत रिटर्न दे सकती है |

Equity Funds के प्रकार

म्यूच्यूअल फण्ड अलग-अलग प्रकार के होते है क्योकिं कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन कम या ज्यादा होता है | और ये कंपनियां विभिन्न सेक्टर या इंडस्ट्री की हो सकती है |

इसके साथ ही फण्ड हाउस या एसेट मैनेजमेंट कंपनियों के स्टाइल के आधार पर भी म्यूच्यूअल फण्ड कई प्रकार के हो सकते है |

स्माल कैप, मिड कैप, लार्ज कैप या मल्टी कैप

यहाँ कैप का मतलब मार्केट कैपिटलाइजेशन है | शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियां मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर छोटी-बड़ी होती है |

इस प्रकार जो फण्ड ज्यादा मार्केट कैप वाले अच्छी कंपनियों में पैसा लगाती है उसे लार्ज कैप फण्ड कहते है | इसमें बाजार का उतार-चढाव थोड़ा कम होता है |

वहीं जो फण्ड मीडियम कैप व स्मालकैप वाले कंपनियों में पैसा लगाती है उसे क्रमशः मिड कैप व स्मालकैप फण्ड कहते है | इन फण्ड में बाज़ार के ऊपर-नीचें होने पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है |

सेक्टर फण्ड, डाइवर्सिफाइड फण्ड और थीमेटिक फण्ड

सेक्टर फण्ड का पैसा एक ही सेक्टर के कई कंपनियों में निवेश किया जाता है | जैसे आईटी, बैंकिंग, रिटेल, एग्रीकल्चर सेक्टर आदि | इसमें एक ही सेक्टर में इन्वेस्ट होने से निवेशक को जोखिम भी ज्यादा होता है |

जबकि डाइवर्सिफाइड फण्ड में लगाया पैसा अलग-अलग सेक्टर के कंपनियों में इन्वेस्ट किया जाता है इसलिए इसमें जोखिम सेक्टर फण्ड की तुलना में कम हो जाता है |

थीमेटिक फण्ड का पैसा एक थीम को फॉलो करके लगाया जाता है | जैसे स्टार्टअप आदि |

एक्टिव फण्ड और पैसिव फण्ड

ये फण्ड पूरी तरह से फण्ड हाउस व फण्ड मैनेजर के इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी पर निर्भर करता है | अगर फण्ड मैनेजर कंपनियों का एनालिसिस व रिसर्च करके उसे अपने पोर्टफोलियो में रखता है तो ऐसे फण्ड को एक्टिव फण्ड कहते है |

जबकि पैसिव फण्ड उसे कहते है जिसमे फण्ड मैनेजर इंडेक्स ( सेंसेक्स व निफ्टी आदि) के कंपनियों में निवेश करता है जिससे इसका रिटर्न भी इंडेक्स के समान ही आता है इसलिए इस फण्ड को इंडेक्स फण्ड भी कहते है|
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Sep 21, 2019

डेट फण्ड क्या है | डेट फण्ड के प्रकार | What are Debt Mutual Funds in Hindi

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क्या आप म्यूच्यूअल फण्ड में इन्वेस्ट करना चाहतें है लेकिन ज्यादा रिस्क लेने से डरते है ? अगर हाँ तो आप बिल्कुल सही पोस्ट पढ़ रहे है | आज के इस पोस्ट में आप डेट फण्ड के बारे में सीखने वाले है | तो चलिए जानतें है Debt Mutual funds क्या होता है |

Debt Mutual Funds in Hindi

Debt Mutual Funds क्या है ?

डेट फण्ड, म्यूच्यूअल फण्ड का एक विकल्प है | यह उन निवेशकों के लिए बेहतर है जो कम रिस्क लेकर अपनें पैसे को निवेश करना चाहते है | डेट फण्ड में निवेशकों के लगायें पैसे को सरकारी प्रतिभूतियों, कॉर्पोरेट बांड, ट्रेज़री बिल, व अन्य प्रकार के सिक्योरिटीज़ में लगाया जाता है अर्थात् उधार के रूप में संस्थाओ को दिया जाता है|

डेट फण्ड में इक्विटी फण्ड के तुलना में रिस्क कम होता है | इक्विटी फण्ड में पैसा कंपनियों के शेयर में लगाया जाता है इसलिए इक्विटी फण्ड में रिस्क ज्यादा होता है |

डेब्ट फण्ड में लगाया गया पैसा एक निश्चित समय के लिए, निश्चित ब्याज़ दर पर लगाया जाता है | अतः निवेशकों को इस बात का खबर रहता है कि समयावधि समाप्त होने पर उन्हें एक "फिक्स इनकम" मिलने वाला है | डेट फण्ड को फिक्स इनकम मिलने के वजह से ही फिक्स इनकम सिक्यूरिटी कहा जाता है |

डेट फण्ड में लगाया पैसा कम या ज्यादा समय के लिए अलग-अलग क्रेडिट रेटिंग्स की सिक्योरिटीज़ में भी लगाया जाता है ताकि निवेशकों को बेहतर रिटर्न दिलाया जा सकें, परंतु कई बार क्रेडिट रेटिंग्स के आधार पर इन सिक्योरिटीज़ में रिस्क भी होते है | जहां ज्यादा क्रेडिट रेटिंग वालें संस्थाओ अपना उधारी व ब्याज़ चुकाने में बेहतर मानी जाती है |

आप डेट फण्ड में कम समय (3 या 6 माह ) या लम्बे समय के (3 या 5 साल से अधिक ) के लिए इन्वेस्ट कर सकते है | समय ( मैच्योरिटी) के आधार पर डेट फण्ड भी अलग-अलग हो सकते है |

डेट फण्ड में 3 साल या उससे ज्यादा होने के बाद 20% का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगाया जाता है जबकि शोर्ट-टर्म में निवेशक को डेट फण्ड से मिलने वाले कैपिटल गेन को टोटल इनकम में जोड़कर सरकार द्वारा निर्धारित टैक्स स्लैब के आधार पर टैक्स देना होता है |

Debt Mutual Funds कैसे करता है ?

इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड कंपनियों के शेयर पर निर्भर होता है उसी प्रकार डेट म्यूच्यूअल फण्ड पूरी तरह से ब्याज़ दर पर निर्भर करता है |

ब्याज़ दर (रेपो रेट व रिवर्स रेपो ), जिसे रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) नियंत्रित करती है अर्थात RBI ही ब्याजदर को अर्थव्यवस्था के परिस्थितियों के आधार पर कम या ज्यादा करती है |

और इस ब्याजदर के उतार-चढाव के आधार पर ही कॉर्पोरेट बांड या डेट सिक्योरिटीज जारी करती है | इसका मतलब है कि डेट फण्ड का रिटर्न ब्याजदर पर निर्भर होता है |

अगर ब्याजदर कम होता है तो बांड की कीमत बढ़ जाती है और निवेशकों को अच्छा रिटर्न मिलता है जबकि ब्याजदर ज्यादा होता है तो बांड की कीमत घट जाती है | इसका मतलब डेट इंस्ट्रूमेंट का की कीमत ब्याजदर के विपरीत होता है |

Debt Mutual Fund के प्रकार

जिस तरह इक्विटी फण्ड, मार्केट कैप व इन्वेस्टिंग स्टाइल के आधार कई प्रकार के होते है उसी प्रकार डेट फण्ड मैच्योरिटी के समय के आधार पर कई प्रकार के होते है |

लिक्विड फण्ड - इस फण्ड का पैसा ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है जिन की मैच्योरिटी 91 दिन से ज्यादा नही होती है | यह फण्ड बचत बैंक की तुलना में अच्छा विकल्प होता है क्योकिं इसमें बेहतर रिटर्न मिलता है और कम समय के लिए होता है |

लिक्विड फण्ड का पैसा कम समय में मैच्योर होने वाले डेट इंस्ट्रूमेंट में लगया जाता है इसलिए इसमें रिस्क कम होता है व रिटर्न के नेगेटिव होने का चान्स बहुत ही कम होता है |

डायनामिक फण्ड - डायनामिक फण्ड में, निवेश में मिलने वाला ब्याज़ दर बदलता रहता है इसलिए निवेश के मैच्योर होने का समय भी बदलता रहता है अर्थात ब्याज दर से सीधा सम्बन्ध होने के कारण पैसे का निवेश भी जल्दी या देर से किया जाता है |

शोर्ट टर्म या अल्ट्रा शोर्ट टर्म डेट फण्ड - ये डेट फंड्स ऐसे इन्वेस्टर के लिए बहुत ही उपयुक्त है जो 3 साल के लिए निवेश करना चाहते है क्योकिं यह फण्ड 3 साल में मैच्योर हो जाते है | इसके साथ ही ब्याज़ दर में बदलाव का भी इन फंड्स में ज्यादा प्रभाव नही होता है |

इनकम फण्ड - इनकम फण्ड में मैच्योरिटी का समय कम से कम 5 औसतन होता है इसलिए इस फण्ड का पैसा ब्याज़ दर के आधार पर अलग-अलग सिक्योरिटीज़ में लगाया जाता है ताकि निवेशकों को बेहतर रिटर्न दिलाया जा सकें |

गिल्ट फण्ड - इस फण्ड का पैसा केवल सरकारी सिक्योरिटीज में इन्वेस्ट किया जाता है | गिल्ट फण्ड उन निवेशकों के लिए बेहतर माना जाता है जो कम रिस्क के साथ एक अच्छे विकल्प की तलाश में है | गिल्ट फण्ड में क्रेडिट रिस्क कम होता है क्योकिं गिल्ट फण्ड का पैसा सरकारी सिक्योरिटीज में लगाया जाता है |
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Sep 20, 2019

मुद्रास्फीति क्या है | मुद्रास्फीति से महंगाई कैसे बढ़ती है | What is Inflation in Hindi

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What is Inflation in Hindi:क्या मुद्रास्फीति के कारण दैनिक आवश्यकताओं की चीजें महंगी हो जाती है ? क्या मुद्रास्फीति का प्रभाव हम सब पर पड़ता है ? यदि हाँ तो मुद्रास्फीति या महंगाई से बचने के क्या तरीके है ? चलिए जानते है आखिर क्यों मुद्रास्फीति अच्छी नही होती है ?

 What is Inflation in Hindi

मुद्रास्फीति या Inflation क्या है ?

मुद्रास्फीति एक ऐसी स्थिति है जिसमें वस्तुओं (खानें-पीने, दैनिक उपयोग व अन्य सामान ) की कीमत बढ़ जाती है और जिस मुद्रा (रुपयें ) से आप सामान खरीदते है उसकी वैल्यू कम हो जाती है क्योकिं देश में ज्यादा मुद्रा (सिक्के व नोट की संख्या ) हो जाते है |

इस तरह से महंगाई (मुद्रास्फीति ) में रुपयें सभी के पास आ जाते है | जिसकी वजह से मुद्रा से खरीदनें की शक्ति कम हो जाती है क्योकि उपयोग की वस्तुयें कम हो जाती है जिससे वस्तुओं की कीमत आसमान छूने लगती है |

मुद्रास्फीति के समय भी देश में मुद्रा (रुपयें ) का चलन तो पहले जैसा ही होते रहता है लेकिन इस तरह मुद्रा की वैल्यू घटने पर भी प्रभाव दिखाई नही देता है |

इसका सबसे ज्यादा प्रभाव कम इनकम वाले एवं मध्यमवर्गीय परिवार पर होता है क्योकिं महंगाई बढ़ने के कारण ऐसे परिवार अपनी दैनिक उपयोग के वस्तुओं(खानें-पीने, दैनिक उपयोग के अन्य सामान ) को भी खरीद नही पाते है |

याद करिये आज से 10 साल पहले 100 रुपयें में आप बहुत सा सामान खरीद कर ले आते थे लेकिन आज 100 रुपयें में केवल एक या दो सामान ही मिलती है | इसकी मुख्य वजह मुद्रास्फीति (महंगाई) है |

उदाहरण: आज एक कुर्सी 100 रुपयें  में मिलता है और आप 100 रुपयें  बैंक में जमा करते है | एक साल बाद कुर्सी  की कीमत 106 (100 + 6 महंगाई) रुपयें हो जाती है लेकिन आपके बैंक में जमा 104 (100+ 4 ब्याज ) रुपयें होते है मतलब आपके 100 रुपयें में खरीदनें की शक्ति 2 प्रतिशत कम हो गयी है |

मुद्रास्फीति हर साल 5% - 6% की दर से बढ़ती है मतलब हर साल मुद्रा ( रूपये ) से खरीदनें की शक्ति 5-6 प्रतिशत कम होते जाती है इसलिए मुद्रा (रुपयें ) के खरीदनें की शक्ति को बढ़ाना जरुरी हो जाता है |

महंगाई या मुद्रास्फीति (inflation) से कैसे बचें?

मुद्रास्फीति या महंगाई से बचने का केवल एक ही तरीका है | इससे बचनें के लिए आपको मुद्रा (रुपयें) की वैल्यू को बढ़ाना है | मुद्रा (रुपयें) की वैल्यू बढ़ाने के लिए आपको मुद्रा (रुपयें) को सही से उपयोग में लाना है |
  • मुद्रा की बचत करना 
  • मुद्रा की बचत कर बैंक में न रखना क्योकिं बैंक में 4% ब्याज मिलता है जो महंगाई दर (6%) से कम है
  • बचत करने के बाद मुद्रा का निवेश करना ताकि महंगाई दर से ज्यादा का ब्याज ( रिटर्न ) मिल सके
नोट: निवेश का अर्थ = किसी ऐसे जगह में मुद्रा(रूपये) को लगाना जिसमें रिस्क या जोखिम कम हो और जिससे महंगाई दर (6%) से ज्यादा का ब्याज ( रिटर्न ) मिल सकें |
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Sep 17, 2019

इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम क्या है | Equity Linked Savings Scheme (ELSS) in Hindi

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क्या आप टैक्स बचाने के साथ-साथ अपने निवेश में अच्छा रिटर्न भी कमाना चाहते है ? और क्या यह संभव है ?तो चलिए जानतें है यह कैसे संभव है व ELSS क्या है और इसके क्या-क्या फायदे है ?
ELSS in Hindi

Equity Linked Savings Scheme या ELSS क्या है?

ईएलएलएस या इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम के नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ईएलएलएस एक टैक्स सेविंग स्कीम है | अर्थात् ईएलएलएस में पैसे लगाकर आप सेक्शन 80सी के तहत 1.5 लाख रुपयें तक के निवेश में टैक्स छूट का फायदा उठा सकतें है |

ईएलएलएस एक इक्विटी फण्ड होता है | अगर आप ELSS में पैसा लगाते है तो यह पैसा इनडायरेक्ट रूप से इक्विटी या शेयर में लगाया जाता है अर्थात् आप ईएलएलएस में पैसा लगाकर टैक्स में छुट व ज्यादा रिटर्न कमा सकतें है |

Equity Linked Savings Scheme में लगाया गया पैसा 3 साल के लिए लॉक हो जाता है मतलब ईएलएलएस का लॉक इन पीरियड 3 साल का होता है | ईएलएलएस ही एक ऐसा टैक्स सेविंग स्कीम है जिसका लॉक इन पीरियड अन्य टैक्स सेविंग स्कीम की तुलना में बहुत कम है |

पीपीएफ (पब्लिक प्रोविडेंट फण्ड ) का लॉक इन पीरियड 15 साल है, जबकि एफडी (फिक्स्ड डिपाजिट ) का 5 साल लॉक इन पीरियड है | जो ELSS के लॉक इन पीरियड से ज्यादा है | इसके साथ ही ELSS में रिटर्न भी अन्य स्कीमों की तुलना में बेहतर होता है |

यह लॉन्ग टर्म में इन्वेस्ट कर संपत्ति बनाने का बेहतर विकल्प कहा जा सकता है | इसके अतिरिक्त ईएलएलएस के निवेश से मिलने वाला रिटर्न 1 लाख रुपयें से ज्यादा होने पर 10% लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लिया जाता है |

क्या ELSS में निवेश करना सही है?

ईएलएलएस या इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में रिटर्न व रिस्क अधिक होता है क्योकिं इसमें इन्वेस्ट किया गया पैसा इक्विटी मतलब कंपनियों के शेयर में लगाया जाता है | अतः केवल टैक्स सेविंग के लिए ही ELSS में इन्वेस्ट न करें|

अगर आप स्टॉक या शेयर के उतार-चढ़ाव के रिस्क को संभाल सकते है तभी आपको ईएलएलएस में पैसे लगाने चाहिये, अन्यथा ELSS आपके लिए सही नही है |

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Sep 16, 2019

एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड (ईटीएफ ) क्या होता है | Exchange Traded Fund (ETF) in Hindi

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ETF का फुल नाम Exchange Traded Fund (एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड) होता है | मगर ETF क्या है ? और ये म्यूच्यूअल फण्ड से अलग क्यों है ? और ETF के क्या-क्या फायदे होते है ?
Exchange Traded Fund (ETF) in Hindi

Exchange Traded Fund या ETF क्या है ?

एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड को अगर अलग-अलग समझते है तो एक्सचेंज का अर्थ स्टॉक एक्सचेंज, ट्रेडेड का अर्थ खरीदने-बेचने वाला, फण्ड मतलब बहुत से इन्वेस्टर्स का पैसा |

इस तरह से ETF या एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड का मतलब स्टॉक एक्सचेंज में हर दिन बाजार के निर्धारित समय में ख़रीदा व बेचा जाने वाला फण्ड है | ETF अलग-अलग सिक्योरिटीज़ ( शेयर, बांड, कमोडिटी, मुद्रा आदि) के आधार पर कई प्रकार के हो सकते है | इनमें से कुछ नीचें दिए गये है |

Exchange Traded Fund के प्रकार

गोल्ड ETF- गोल्ड ETF का प्राइस सोने के प्राइस पर बेस्ड होता है जब गोल्ड का प्राइस ऊपर जाता है तो गोल्ड ETF का प्राइस भी ऊपर जाता है और गोल्ड के दाम नीचें जाता है तो ETF का प्राइस भी नीचें चला जाता है |

करेंसी ETF- यह ETF आपको किसी देश के करेंसी को खरीदें बिना ही करेंसी मार्केट में भाग लेने का मौका देता है |

इंडेक्स फण्ड ETF- यह ETF एक पैसिव म्यूच्यूअल फण्ड की तरह होता है | जब कोई इन्वेस्टर इंडेक्स फण्ड या इंडेक्स फण्ड ETF खरीदता है तो वह इंडेक्स (सेंसेक्स, निफ्टी आदि ) के अंतर्गत आने वाले स्टॉक या शेयर के एक पोर्टफोलियो को खरीदता है |

ETF या Exchange Traded Fund के क्या फायदे है ?

  • इसका एक्सपेंस रेश्यो अन्य फण्ड की तुलना में कम होता है
  • यह मार्केट ओपन होने के बाद आसानी से ख़रीदा व बेचा जा सकता है 
  • यह डाइवर्सिफाइड होता है तो रिस्क भी कम हो जाता है
  • टैक्स लाभ के लिए भी ETF सही होता है
  • इसमें रिटर्न भी शेयर के इंडेक्स की तरह मिलता है

Exchange Traded Fund और Mutual Fund में अंतर

ETF व म्यूच्यूअल फण्ड दोनों में अंतर होता है | ETF के मूल्य में बदलाव रियल टाइम में होता है जबकि म्यूच्यूअल फण्ड NAV के मूल्य में परिवर्तन दिन के अंत में होता है |

ETF को म्यूच्यूअल फण्ड के एनएफओ की तरह ही एसेट मैनेजमेंट कम्पनी पेश करती है उसके बाद ETF शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिए लिस्ट किया जाता है |

एक निवेशक ETF को रियल टाइम मूल्य में खरीद-बेच सकता है मतलब ETF का ट्रेडिंग किया जा सकता है जबकि म्यूच्यूअल फण्ड में ट्रेडिंग संभव नही है |

ETF को खरीदनें- बेचने के लिए डीमैट अकाउंट होना जरुरी है पर म्यूच्यूअल फण्ड खरीदनें के लिए डीमैट अकाउंट होना जरुरी नही है |

इसके अतिरिक्त ETF में एक्सपेंस रेश्यो (फण्ड का खर्च ) भी म्यूच्यूअल फण्ड की तुलना में कम होता है |

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