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म्यूच्यूअल फण्ड KYC कैसे करें | How to Complete Your Mutual Funds KYC in Hindi

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क्या आप जानते है म्यूच्यूअल फण्ड KYC क्या है और KYC कैसे करते है? तो चलिए जानते है क्यों म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करने के लिए KYC कराना जरुरी होता है |

Mutual Funds KYC in Hindi

अगर आप किसी भी म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश/ इन्वेस्ट करना चाहते है तो आपको KYC कराना पड़ता है | KYC (Know your Customer ) कस्टमर मतलब आपके बारे में (नाम, पता, व्यवसाय आदि ) को जानने का वन टाइम प्रोसेस होता है अर्थात KYC कम से कम एक बार करना जरुरी है |

सेबी ( जो कैपिटल मार्केट को कण्ट्रोल करता है ) ने म्यूच्यूअल फण्ड में इन्वेस्टमेंट करने वालों के लिए KYC प्रक्रिया पूरा करना अनिवार्य कर रखा है ताकि धोखाधड़ी गतिविधियों को रोका जा सके |

म्यूच्यूअल फण्ड KYC कैसे करें

Mutual Fund की KYC आप नीचे दिए किसी भी सेबी रजिस्टर्ड इंटरमीडियारीज के पास पूरा कर सकते है -

  • KYC रजिस्ट्रेशन एजेंसी (KRA) जैसेः डिपाजिटरी (CSDL, NDSL), CAMS आदि
  • एसेट मैनेजमेंट एजेंसी

इन सब सेबी रजिस्टर्ड इंटरमीडियारीज से म्यूच्यूअल फण्ड KYC आप ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों तरीकों से कर सकते है |

Mutual Funds KYC कैसे करें -Offline

  • फण्ड हाउस (एसेट मैनेजमेंट कंपनी) के ऑफिस या KYC रजिस्ट्रेशन एजेंसी के ऑफिस जाये
  • KYC फॉर्म भरकर अपना एड्रेस व पहचान का प्रमाण दे |
  • आधार कार्ड व पैन कार्ड

Mutual Funds KYC कैसे करें - Online

  • फण्ड हाउस या KYC रजिस्ट्रेशन एजेंसी के वेबसाइट पर जायें व अपना एक इन्वेस्टर अकाउंट बनाये
  • अपने आधार लिंक मोबाइल number से अपने अकाउंट को वेरीफाई करें
  • अपने आधार कार्ड व पैन कार्ड की स्कैन कॉपी अपलोड करें


म्यूच्यूअल फण्ड कट ऑफ टाइम क्या है - Mutual Fund Cut-off Timings Hindi

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क्या आप जानते है म्यूच्यूअल फण्ड कट ऑफ टाइम क्या है, और Mutual Fund Cut-off Timings का आपके निवेश पर क्या प्रभाव पड़ता है? तो चलिए म्यूच्यूअल फण्ड कट ऑफ़ टाइम को समझते है और जानते है कट ऑफ़ टाइम क्यों जानना आवश्यक है|

Mutual Fund Cut-off Timings

म्यूच्यूअल फण्ड कट ऑफ टाइम क्या है (Mutual Fund Cut-off Timings)

Mutual Fund Cut-off Timings यह बताता है कि अगर हम म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट्स खरीदते या बेचते है तो उस समय में म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट्स का दाम क्या होगा मतलब म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट्स का NAV (net asset value) क्या होगा |

Mutual Fund Cut-off Timings लिक्विड फण्ड, इक्विटी फण्ड व डेब्ट फण्ड में अलग अलग होती है | जैसे इक्विटी फण्ड के लिए कट ऑफ़ टाइम दोपहर 3 बजे का होता है | चलिए इन्हें और डिटेल में समझते है|

इक्विटी फण्ड- इस फण्ड का कट ऑफ़ टाइम 3 बजे का होता है मतलब अगर आप 3 बजे से पहले इक्विटी फण्ड के लिए एप्लीकेशन देते है तो आपको उसी दिन के NAV के हिसाब से म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट्स मिलते/देते  है |

अगर आप 3 बजे के बाद एप्लीकेशन देते है तो आपको अगले दिन के NAV के हिसाब से म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट्स मिलते/देते  है |

डेब्ट फण्ड- इस फण्ड का कट ऑफ़ टाइम भी इक्विटी फण्ड की तरह 3 बजे होता है और इसमें प्रोसेस इक्विटी फण्ड की तरह ही है |

लिक्विड फण्ड - इस फण्ड का कट ऑफ़ टाइम 2 बजे होता है मतलब अगर आप 2 बजे से पहले म्यूच्यूअल फण्ड के लिए रिक्वेस्ट करते है तो आपको पिछले दिन के NAV के हिसाब से म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट मिलते/देते है|

यदि आप 2 बजे के बाद म्यूच्यूअल फण्ड के लिए रिक्वेस्ट करते है तो आपको उसी दिन के NAV हिसाब से म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट्स मिलते/देते है |

म्यूच्यूअल फण्ड कट ऑफ़ टाइम जानना क्यों आवश्यक है?

यदि आप लम्बे समय के लिए एक बड़ी रकम निवेश करना चाहते है तो Mutual Fund Cut-off Timings को न जानना आपके इन्वेस्टमेंट व रिटर्न में एक बड़ा अंतर दिखा सकता है इसलिए अपने अनुसार NAV के हिसाब से म्यूच्यूअल फण्ड की यूनिट्स खरीदने व बेचने के लिए आपको म्यूच्यूअल फण्ड की कट ऑफ़ टाइम को आवश्यक रूप से जानना चाहिए|

म्यूच्यूअल फण्ड के चार्जर्स क्या है | Mutual Fund Charges in Hindi

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क्या आप जानते है म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करने के क्या-क्या चार्जर्स (Mutual Fund Charges) लगते है? म्यूच्यूअल फण्ड का कास्ट कम होता है या ज्यादा | तो चलिए जानते है म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करने से आपको कौन-कौन से चार्ज देने पड़ते है?

Mutual Fund Charges in Hindi


भारत में म्यूच्यूअल फण्ड बहुत ही तेजी से पॉपुलर हुआ है क्योकिं म्यूच्यूअल फण्ड निवेश का एक बेहतर आप्शन है और इसमें रिटर्न भी काफी अच्छे मिल रहे है और यही कारण है कि ज्यादातर लोग म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश कर रहे है |

म्यूच्यूअल फण्ड के चार्जर्स (Mutual Fund Charges)

अगर आप म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करना चाहते है तो आपको म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करने से पहले mutual fund charges के बारे में अवश्य जानना चाहिए | तो चलिए म्यूच्यूअल फण्ड से जुड़े कुछ चार्ज को देखते है जो आपको निवेश करने से पहले ध्यान में रखना चाहिए |

Entry Load

जब पहली बार एक निवेशक किसी म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम में निवेश करता है तो उसे entry load के रूप में चार्ज देना होता है लेकिन सन 2009 में, SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया) ने entry load के चार्ज को सभी प्रकार के म्यूच्यूअल फण्ड स्कीमों से हटा दिया था |

अब भारत में म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करने पर entry load चार्ज नही देना पड़ता है, अन्यथा पहले भारत में entry load चार्ज लगभग 2.25% हुआ करता था |

फण्ड हाउस के द्वारा entry load चार्ज लेने का उद्देश्य म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम को प्रमोट करने के लिए लगने वाले खर्चे को मैनेज करने के लिए लिया जाता था |

Exit Load

जब एक निवेशक म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट्स को रिडीम करता है तो उसे exit load चार्ज देना पड़ता है | exit load चार्ज किसी भी स्कीम का एक मुख्य खर्च होता है जिसे इन्वेस्टर को म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट्स को रिडीम करते वक्त देना होता है |

exit load का चार्ज लेना अनिवार्य नही है लेकिन exit load चार्ज होने के कारण इन्वेस्टर एक स्कीम से दूसरें स्कीम में स्विच करने से रोकती है, हालाकिं भारत में फण्ड हाउस exit load चार्ज 1% रखती है ताकि निवेशकों को आकर्षित कर सकें |

exit load चार्ज अलग-अलग स्कीमों में अलग-अलग हो सकती है | सेबी के गाइडलाइन्स के अनुसार, exit load का चार्ज रिडेम्पशन अमाउंट का 7% मैक्सिमम हो सकता है |

Expense Ratio

म्यूच्यूअल फण्ड में लगने वाले चार्ज में एक्सपेंस रेश्यो सबसे महत्वपूर्ण है, जिसे आपको पता होना चाहिए | एक्सपेंस रेश्यो, फण्ड हाउस के द्वारा म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम को मैनेज करने के लिए वार्षिक शुल्क के रूप में  लिया जाता है, आमतौर पर एक्सपेंस रेश्यो को % के रूप में दर्शाया जाता है |

एक्सपेंस रेश्यो, म्यूच्यूअल फण्ड निवेशकों से स्कीम के प्रमोशन, मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन, मैनेजमेंट व एडमिनिस्ट्रेशन के लिए लिया जाता है | जब टोटल एक्सपेंस को एक म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम के AUM (एसेट अंडर मैनेजमेंट ) से डिवाइड किया जाता है तो एक्सपेंस रेश्यो मिलता है |

Mutual Funds रिडीम कैसे करें | Mutual Funds का पैसा कैसे निकाले | Mutual Funds Redemption Hindi

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Mutual Funds रिडीम कैसे करें मतलब म्यूच्यूअल फण्ड में जमा किया गया पैसा कैसे निकाले ? क्या आप म्यूच्यूअल फण्ड रिडीम करने के तरीके जानते है | चलिए जानते है म्यूच्यूअल फण्ड रिडीम कैसे करें जिससे म्यूच्यूअल फण्ड का पैसा निकल जाये |

हम सब म्यूच्यूअल फण्ड में पैसे लम्बे समय के लिए निवेश करते है लेकिन कई बार हम अपनी जरुरत के लिए या फिर किसी दुसरे म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करने के लिए म्यूच्यूअल फण्ड से पैसा निकलना चाहते है तो चलिए जानते है म्यूच्यूअल फण्ड से पैसा निकालने का प्रोसेस क्या है |
Mutual Funds Redemption Hindi

Mutual Funds Redeem कैसे करें ?

जब हम म्यूच्यूअल फण्ड खरीदते है या निवेश करते है तो हमें म्यूच्यूअल फण्ड की यूनिट दी जाती है जिसकी प्राइस घटते-बढते रहती है जिसके कारण हमें फायदा या नुकसान होता है |

अब जब हम म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट को सेल करना चाहते है या अपना पैसा निकलना चाहते है तो हमें कुछ प्रोसेस करनी पड़ती है जिसे म्यूच्यूअल फण्ड रिडीम कहते है |

Mutual Funds Redeem करने के दो तरीके है - ऑनलाइन व ऑफलाइन

Online Mutual Funds Redeem

आप घर बैठे मोबाइल व इन्टरनेट की मदद से ऑनलाइन म्यूच्यूअल फण्ड रिडीम कर सकते है | ज्यादातर म्यूच्यूअल फण्ड कंपनी ऑनलाइन म्यूच्यूअल फण्ड रिडीम का आप्शन देती है |

घर बैठे म्यूच्यूअल फण्ड रिडीम करने के लिए आपको म्यूच्यूअल फण्ड हाउस के वेबसाइट में जाकर आपको अपनी यूजर ID, PAN नंबर या फोलियो नंबर आदि से लॉग इन करना है |

अब आपको एक एप्लीकेशन फॉर्म या Mutual Funds Redeem फॉर्म भरकर सबमिट कर देना है | फॉर्म सफलतापूर्वक सबमिट होने के बाद आपको रजिस्टर्ड ईमेल व फ़ोन नंबर पर एक कन्फर्मेशन मेसेज आयेगा

और फिर एप्लीकेशन फॉर्म अप्रूव होने के बाद आपका पैसा आपके बैंक खाते 3 से 4 दिन में आ जायेगा, अगर आपने अपनी म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम खरीदते वक्त बैंक डिटेल्स दी है |

Offline Mutual Funds Redeem

mutual fund ऑफलाइन रिडीम  करने के लिए आपको म्यूच्यूअल फण्ड ऑफिस या म्यूच्यूअल फण्ड एजेंट के पास जाना है |

म्यूच्यूअल फण्ड ऑफिस में आपको एक एप्लीकेशन फॉर्म या रिडेम्पशन फॉर्म भरना है जिसमें आवश्यक डिटेल भरने है जैसे - अपना नाम, फोलियो नंबर, पैन नंबर, म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम का नाम और आप कितना यूनिट्स या पैसा रिडीम करना/निकलना चाहते है |

रिडेम्पशन फॉर्म भरने के बाद ऑफिस में जमा कर देना है और उसके बाद जब म्यूच्यूअल फण्ड हाउस/कंपनी एप्लीकेशन फॉर्म अप्रूव कर लेती है तो आपका पैसा आपके बैंक अकाउंट में 3 से 4 दिन में आ जाता है | अगर आपने अपनी म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम खरीदते वक्त बैंक डिटेल्स दी है |

Mutual Funds Redeem करते समय ध्यान रखें?

म्यूच्यूअल फण्ड एक साल से कम समय में रिडीम करते है तो 1% एग्जिट लोड देना पड़ता है | म्यूच्यूअल फण्ड के एग्जिट लोड चार्ज व समय म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम के अनुसार अलग अलग होते है |

म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट्स बेचते समय वर्तमान NAV मतलब एक म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट का दाम आवश्यक चेक करें क्योकिं इसी के आधार पर आपको पैसा मिलता है |

म्यूच्यूअल फण्ड रिडीम करते समय लगने वाले टैक्स का भी ध्यान रखे |

कई म्यूच्यूअल फण्ड का एक फिक्स समय (लॉक in पीरियड) होता है तो समय से पहले आप म्यूच्यूअल फण्ड रिडीम नही कर सकते है | जैसे: ELSS में 3 साल 

क्या म्यूच्यूअल फण्ड सुरक्षित है | Are Mutual Funds Safe?

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भारत में म्यूच्यूअल फण्ड का निवेश लगातार बढ़ता जा रहा है लेकिन कई बार निवेशकों के मन में यह सवाल आता है कि क्या म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करना सुरक्षित है ? कोई म्यूच्यूअल फण्ड कंपनी अपना बिज़नस बंद करके भाग जाएगी तो क्या होगा ?  तो चलिए जानते है |
Are Mutual Funds Safe?


म्यूच्यूअल फण्ड में मार्केट से जुड़े रिस्क होते है क्योकिं म्यूच्यूअल फण्ड का पैसा शेयर बाजार, बांड, गोल्ड आदि सिक्योरिटीज़ में लगाया जाता है लेकिन इन रिस्क को आप अपने रिस्क प्रोफाइल के आधार पर कम या ज्यादा कर सकते हो |

आप म्यूच्यूअल फण्ड के कोई भी प्रकार - इक्विटी फण्ड, डेट फण्ड, हाइब्रिड फण्ड चुन सकते है| अब मान लीजिये कि आप ने एक बेहतर म्यूच्यूअल फण्ड चुन लिया और आपको अच्छे रिटर्न की भी उम्मीद है लेकिन क्या म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करना सुरक्षित है ? क्या हम म्यूच्यूअल फण्ड हाउस पर इतना भरोसा कर सकते है कि वे हमारे पैसे लेकर भाग नही सकती है ?

क्या म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश सुरक्षित है?

सिक्म्यूयोरिटीज एंड एक्च्यूसचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (SEBI) एक ऐसी संस्था है जो शेयर बाजार , म्यूच्यूअल फण्ड जैसे सिक्योरिटीज को रेगुलेट (कण्ट्रोल ) करती है |

SEBI का काम ही यह है कि कोई भी निवेशकों के पैसे को हानि न पंहुचा सके और यदि कोई ऐसा करने की कोशिश करते भी पाया जाता है तो उसपर तुरंत कड़ी कार्यवाही की जाती है |

म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करना सुरक्षित होता है इसमें इन्वेस्ट करने से आपको बिल्कुल भी नहीं डरना चाहिए क्योकिं भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड (सेबी) आपके पैसे की सेफ्टी के लिए जरुरी कदम उठाता है जो नीचें दिए गये है -


  • म्यूच्यूअल फण्ड कंपनी या एसेट मैनेजमेंट कंपनी को रेगुलेट (कण्ट्रोल ) करता है 
  • कोई भी स्कीम या प्रोडक्ट को SEBI के द्वारा ही अनुमति दी जाती है 
  • सेबी के नियम अनुसार कोई म्यूच्यूअल फण्ड कंपनी बिज़नस बंद करके भाग नही सकती है 
  • म्यूच्यूअल फण्ड कंपनी बिज़नस बंद करना चाहती है तो सेबी के नियमों का पालन करना होता है 
  • म्यूच्यूअल फण्ड कंपनी दिवालिया (बैंकरप्ट) होने पर भी स्कीम का पैसा सुरक्षित होता है क्योकिं यह एक ट्रस्ट में  होता है और म्यूच्यूअल फण्ड कंपनी पैसे को हाथ नही लगा सकती है
  • म्यूच्यूअल फण्ड कंपनियों का रेगुलर ऑडिट SEBI करता है 

बेस्ट म्यूच्यूअल फण्ड कैसे चुनें - Best Mutual Funds in Hindi

क्या अक्सर निवेश करने से पहले आपके मन में ख्याल आता है कि एक best mutual funds कैसे चुने ? यह एक आम बात है मेरे मन में भी ऐसा ख्याल आता है- कौन सा mutual funds बेस्ट है? किस mutual funds से ज्यादा रिटर्न मिलता है?

तो चलिए आज जानते है कि best mutual funds कैसे चुनते है, जिससे आप रिस्क कम करके बेहतर रिटर्न कमा सके |
Best Mutual Funds in hindi

Best Mutual Funds कैसे चुनें ?

अगर म्यूच्यूअल फण्ड में पैसा लगाना ही है तो क्यों न एक best mutual funds को चुना जाए जिससे की लॉन्ग टर्म में हमें बेहतर रिटर्न मिले व हम अपने लक्ष्य को हासिल कर सकें |

एक बेस्ट म्यूच्यूअल फण्ड को चुनने के लिए आपको कुछ फैक्टर्स को ध्यान रखना होता है तो चलिए इन फैक्टर्स को एक-एक करके देखते है -

फण्ड का उम्र और प्रदर्शन

किसी भी फण्ड में इन्वेस्ट करने से पहले आपको फण्ड की उम्र कितना है, क्या फण्ड अभी-अभी लायी गयी है या फण्ड 4-5 साल या उसके भी अधिक पुरानी है |

इसके अतिरिक्त फण्ड ने पिछलें 3-5 वर्ष में कैसा प्रदर्शन किया है, क्या फण्ड ने लगातार अच्छा रिटर्न दिया है और क्या आगे आने वर्षों में भी बेहतर प्रदर्शन करने वाली है | इन सब को जरुर पता करें |

फण्ड ने 1 साल में व 3 साल में निवेशकों को कितना रिटर्न दिया है अर्थात् छोटी व लम्बी अवधि में कैसा रिटर्न दिया है |

इसके साथ ही फण्ड ने बाजार में कमजोरी के वक्त कैसा प्रदर्शन किया है, अगर बाजार में गिरावट (Bear मार्केट) के समय भी फण्ड में ज्यादा गिरावट नही आई है तो यह एक बेहतर फण्ड का संकेत होता है |

फण्ड का खर्च

एक फण्ड आपको बेहतर रिटर्न दे सकता है, लेकिन क्या वह फण्ड खर्च भी ज्यादा लेता है | अगर ऐसा है तो आप फण्ड के कास्ट को सावधानीपूर्वक कैलकुलेट करें |

क्योकिं आप लम्बें समय तक फण्ड में निवेश करने वालें है तो 1% - 2% का अतिरिक्त खर्च भी लॉन्ग टर्म में बहुत ज्यादा होता है | इसलिए किसी फण्ड में इन्वेस्ट करने से पहले फण्ड का खर्च जरुर चेक करें |

निवेशित रहने का समय (Time Horizon)

एक बेहतर म्यूच्यूअल फण्ड स्कीम चुनने के लिए time horizon भी महत्वपूर्ण होता है |

यह जानने के बाद कि आप किसी फण्ड में कितने समय तक निवेशित रहना चाहते है तो म्यूच्यूअल फण्ड की बहुत से विकल्प में से एक अच्छा आप्शन चुनना आपके लिए आसान हो जाता है |

फण्ड हाउस (AMC)

फण्ड हाउस या एसेट मैनेजमेंट कंपनी पर लोग कितना विश्वास करते है | एक अच्छा फण्ड हाउस वह होता है जो निवेशकों के अच्छे इन्वेस्टमेंट के लिए कई स्कीम्स की विकल्प रखता है |

एक निवेशक को फण्ड हाउस के उम्र, हाउस के मैनेजमेंट का पिछला रिकार्ड, इन्वेस्टमेंट का प्रोसेस, व फण्ड हाउस ने कितना फण्ड (AUM) मैनेज किया है | एक फण्ड हाउस या AMC को चुनने से पहले इन सब बातों को जरुर ध्यान दे |

इसके अलावा यह जरुर पता करे कि फण्ड हाउस के टॉप परफॉर्मेंस वाली कितनी स्कीम्स है |

फण्ड का पोर्टफोलियो

किसी भी फण्ड में निवेश से पहले उस फण्ड के पोर्टफोलियो को अवश्य देखें | क्या फण्ड अच्छी तरह से डाइवर्सिफाई किया गया है मतलब अलग-अलग एसेट क्लास व सेक्टर्स में पैसे लगाया जाता है या नही |

क्या फण्ड में इक्विटी, बांड आदि सिक्योरिटीज़ शामिल है ? क्या निवेशकों के लक्ष्य, रिस्क क्षमता आदि के आधार पर निवेश किया जाता है या फिर फण्ड मैनेजर अपनीं मन से कुछ भी पोर्टफोलियो तो नही बना रहा है |


फण्ड मैनेजर का प्रदर्शन

म्यूच्यूअल फण्ड इन्वेस्टमेंट का एक बेस्ट ऑप्शन माना जाता है क्योकिं इसे प्रोफेशनल फण्ड मैनेजर मैनेज करता है और निवेशकों को बेहतर रिटर्न दिलाने के लिए अच्छे विकल्पों का चुनाव करता है इसलिए एक बेहतर फण्ड मैनेजर को चुनना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है |

किसी फण्ड में पैसा लगाने से पहले आपको फण्ड मैनेजर के पिछलें रिकार्ड, रिटर्न, अनुभव, कितने स्कीम्स का मैनेजमेंट, इन्वेस्टमेंट स्टाइल आदि का अवश्य पता होना चाहियें |



नोट 1: एक फण्ड का पिछला रिकार्ड बेहतर है इसका मतलब फण्ड मैनेजर ने उस फण्ड को अच्छा मैनेज किया है लेकिन क्या वह फण्ड मैनेजर अभी भी फण्ड मैनेज कर रहा है या नहीं |

क्या उस फण्ड मैनेजर के जगह पर कोई नया फण्ड मैनेजर तो फण्ड को मैनेज नही कर रहा है और क्या नया फण्ड मैनेजर अच्छा प्रदर्शन करने में सक्षम है या नही | इन बातों को किसी भी फण्ड में निवेश करने से पहले अवश्य ध्यान रखें |



नोट 2: एक निवेशक के नजरिये से आपको किसी भी mutual funds में इन्वेस्ट करने से पहले अपनी जोखिम उठाने की क्षमता, निवेशित रहने का समय, निवेश का उद्देश्य, रिटर्न की उम्मीद आदि जानना बहुत आवश्यक होता है क्योकिं इससे ही आपको एक best mutual fund सेलेक्ट करने में मदद मिलती है |

म्यूच्यूअल फण्ड में कितना रिस्क होता है | Are Mutual Funds Risky?

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पैसो को निवेश करने से रिस्क तो होता है, कहीं पर ज्यादा रिस्क तो कही पर कम रिस्क और म्यूच्यूअल फण्ड भी इससे बचा नही है | म्यूच्यूअल फण्ड में भी रिस्क होते है लेकिन कितना रिस्क होता है ये बता पाना आसान नही है | फिर भी चलिए जानते है कि म्यूच्यूअल फण्ड में रिस्क क्या होता है |
Are Mutual Funds Risky?

Are Mutual Funds Risky?

"Mutual funds investments are subject to market risk. Please, read all scheme related documents carefully before investing."

ऐसा ही बोला जाता है न टीवी में आने वाले विज्ञापनों में "म्यूच्यूअल फण्ड निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है, योजना से जुड़ें सारे दस्तावेज़ सावधानी से पढ़े |"

यहाँ बाजार कोई भी हो सकता है जैसे शेयर बाजार, गोल्ड, रियल एस्टेट, बांड मार्केट आदि | म्यूच्यूअल फण्ड निवेश का एक बेहतर विकल्प माना जाता है क्योकिं यह डाईवर्सिफ़िइड होता है |

डाईवर्सिफ़िइड मतलब म्यूच्यूअल फण्ड में लगायें निवेशकों का पैसा अलग-अलग एसेट जैसेः शेयर बाजार(इक्विटी), बांड(डेब्ट) आदि में लगाये जाते है इसलिए इन एसेट के आधार पर म्यूच्यूअल फण्ड के कई प्रकार है और इन्ही के आधार पर रिस्क लेवल भी|  जैसे -


  • इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड
  • डेब्ट म्यूच्यूअल फण्ड 
  • हाइब्रिड म्यूच्यूअल फण्ड

इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड

इस फण्ड का रिस्क ज्यादा होता है क्योकिं इक्विटी फण्ड का पैसा शेयर बाजार में कंपनियों के शेयर खरीदनें में लगाया जाता है | इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड कई प्रकार के हो सकते है | जैसे: स्मालकैप, लार्ज कैप आदि |

डेब्ट म्यूच्यूअल फण्ड

इस फण्ड में रिस्क कम होता है क्योकिं डेब्ट फण्ड का पैसा कंपनियों के बांड में व सरकारी बांड में भी लगाया जाता है | डेब्ट म्यूच्यूअल फण्ड के भी अलग- अलग प्रकार है | जैसे: गिल्ट फण्ड, इनकम फण्ड आदि|

हाइब्रिड म्यूच्यूअल फण्ड

इस फण्ड का पैसा कंपनियों के शेयर में और सरकारी व कंपनी के बांडों लगाया जाता है इसलिए इसमें रिस्क  मीडियम होता है | इनके भी कई प्रकार होते है | जैसेः बैलेंस्ड फण्ड, डायनामिक फण्ड

क्या मार्केट रिस्क के अलावा और भी कोई जोखिम है ?

हां, और म्यूच्यूअल फण्ड के रिस्क को कुछ फैक्टर से पता किया जा सकता है और इनमें निवेश करने के लिए उन रिस्क को भी कम किया जा सकता है |

फण्ड मैनेजर की क्षमता व मैनेजमेंट

म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करने के बाद एक रिस्क फण्ड मैनेजर की क्षमता है मतलब अगर आपनें पैसें इन्वेस्ट कियें और फण्ड मैनेजर ने अच्छा परफोर्म नही किया तो आपको रिटर्न भी अच्छे नही मिलेंगे |

मार्केट रिस्क तो सभी के लिए एक सामान होता है लेकिन फण्ड मैनेजर व उसकी टीम की क्षमता का रिस्क हर एक फण्ड में अलग- अलग हो सकता है |

एक अच्छा फण्ड मैनेजर मार्केट रिस्क से भी बचा सकता है इसलिए म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश के रिस्क को कम करने के लिए एक अच्छे फण्ड मैनेजर को चुनना बहुत अवश्यक है |

एक अच्छा फण्ड मैनेजर चुनने के लिए फण्ड मैनेजर ट्रैक रिकार्ड चेक करें, कितने फण्ड मैनेज कर रहा है ? कितने रिटर्न ला रहा है ?


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  • पैन कार्ड 
  • एक फ़ोटो
वही आपको एड्रेस प्रूफ के लिए
  • आधार कार्ड 
व इनकम प्रूफ के लिए जरुरी डाक्यूमेंट्स
  • कैंसल चेक ( Cheque )
  • या बैंक स्टेटमेंट
बस फिर आपका डीमैट अकाउंट शेयर खरीद कर रखने के लिए तैयार है |

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मल्टी कैप फण्ड क्या है | क्या आपको निवेश करना चाहिए | Multi Cap Funds in Hindi

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क्या मल्टी कैप फण्ड , लार्ज कैप फण्ड से बेहतर वेल्थ बनाने वाले फण्ड होते है ? क्या आपको multi cap funds में इन्वेस्ट करना चाहिए ? मल्टी कैप फण्ड में आपको कितने समय के लिए इन्वेस्ट करना चाहिए ?

Multi Cap Funds in Hindi

Multi-Cap Funds क्या है?

Multi Cap Funds एक डायवर्सिफाइड इक्विटी म्यूच्यूअल होता है मतलब Multi Cap Funds का पैसा मार्केट कैप के आधार पर लार्ज कैप, मिडकैप व स्मालकैप कंपनियों में लगाया जाता है |  

मल्टी कैप फण्ड का पोर्टफोलियों बहुत ज्यादा डायवर्सिफाइड होता है क्योकि यह अलग-अलग सेक्टर के लार्ज, मीडियम व स्माल कैप स्टॉक्स से मिलकर बनती है | इसमें SEBI ( Securities and Exchange Board of India) के नियम के तहत 65% पैसा इक्विटी व इक्विटी से रिलेटेड अन्य इंस्ट्रूमेंट में लगाना अनिवार्य है |

Multi Cap Funds एक इक्विटी फण्ड है और इन स्कीम्स में डायनामिक इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी को अपनाया जाता है इसलिए निवेशकों को किसी भी इक्विटी से जुड़े स्कीम्स में निवेश करने का लक्ष्य 5-10 वर्ष का रखना चाहिए |

Multi Cap Funds के फायदे

Multi Cap Funds, फण्ड मैनेजर को अपने होल्डिंग्स को लार्ग कैप, मिड कैप व स्माल कैप कंपनियों में शेयर बाजार के आउटलुक के आधार पर बदलने का लचीलापन देती है  अर्थात जब मिडकैप व स्मालकैप कंपनियों का वैल्यूएशन महंगा होने लगता है तब फण्ड मैनेजर लार्ज कैप स्टॉक्स में जा सकते है |

इसके विपरीत जब लार्ज कैप स्टॉक्स का वैल्यूएशन महंगा होने लगता है तो फण्ड मैनेजर मिडकैप व स्मालकैप स्टॉक्स में निवेश कर सकते है |

इस तरह से प्योर स्मालकैप व मिडकैप फण्ड की तुलना में Multi Cap Funds लम्बे समय में कम रिस्क वाला हो जाता है और निवेशकों को प्योर लार्ज कैप फण्ड से बेहतर रिटर्न देता है |

Multi Cap Funds ऐसे निवेशकों के लिए बेहतर है जो मीडियम रिस्क या बैलेंस्ड रिस्क लेने के साथ बाजार के उतार चढ़ाव को सहन कर सकते है और लॉन्ग टर्म के लिए निवेश करना चाहते है |

म्यूच्यूअल फण्ड क्या है | What is Mutual Funds in Hindi

म्यूच्यूअल फण्ड एनएवी क्या है | नेट एसेट वैल्यू काम कैसे करता है | Mutual Fund NAV in Hindi

रेगुलर म्यूच्यूअल फण्ड क्या है ?
डायरेक्ट म्यूच्यूअल फण्ड क्या है ?

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डेट फण्ड क्या है | डेट फण्ड के प्रकार | Debt Mutual Funds in Hindi
हाइब्रिड फण्ड क्या है | हाइब्रिड फण्ड के प्रकार | Hybrid Mutual Funds in Hindi

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लार्ज कैप फण्ड क्या है | निवेशकों के लिए क्यों है फायदेमंद | Large Cap Mutual Funds in Hindi

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क्या आप म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश कर औसत रिटर्न चाहते है लेकिन ज्यादा रिस्क नही लेना चाहते है ? तो चलिए आज लार्ज कैप म्यूच्यूअल फण्ड के बारे में जानते है जो आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है |

Large Cap Mutual Funds in Hindi

Large Cap Mutual Funds in Hindi

लार्ज कैप फण्ड, इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड का एक प्रकार है | इसमें निवेश किया गया पैसा मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर बड़ी कंपनियों के शेयर्स में लगाये जाते है |

Large Cap Mutual Funds लॉन्ग टर्म में बेहतर रिटर्न दे सकते है और यह म्यूच्यूअल फण्ड में पहली बार निवेश करने लोगों के लिए अच्छा माना जाता है क्योकि लॉन्ग टर्म फण्ड ज्यादा अस्थिर नही होते है और लगातार निवेशकों को एक औसत रिटर्न देते रहते है |

लार्ज कैप फण्ड का 75% से 80% पैसा स्टॉक मार्केट के बड़ी कंपनियों  (मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर ) में लगाया जता है | और शेष 20% से 25% पैसा स्मालकैप व मिडकैप कंपनियों में लगाया जाता है ताकि इन्वेस्टर का रिस्क कम करने के बाद बेहतर रिटर्न भी दिया जा सकें |

Large Cap Mutual Funds क्यों है फायदेमंद

Large Cap Mutual Funds में ज्यादा रिस्क नही होता है क्योकि इसका पैसा लार्ज कैप कंपनीज में निवेश होता है | लार्ज कैप कंपनियां आर्थिक रूप से मजबूत, अच्छे ब्रांड, व ग्राहकों को बेहतर वैल्यू देती है इसलिए इसमें भरोसा भी किया जाता है |

लार्ग कैप कंपनिया लम्बे समय से व्यापार कर रही होता है इसलिए ऐसी कंपनियां कई तेजी व मंदी के समय को देखी रहती है और उन हालातो को अच्छे से हैंडल भी कर सकती है | इसके साथ ही लार्ज कैप कंपनियों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस भी अच्छे से लागू होता है जिसका फायदा लार्ज कैप फण्ड में देखने को मिलता है |

Large Cap Mutual Funds लॉन्ग टर्म में सम्पत्ति बनाने में मदद करती है लेकिन इसके साथ ही शोर्ट टर्म में यह रेगुलर डिविडेंड भी देती है व इसमें रिस्क कम होने से Large Cap Mutual Funds सोने पर सुहागा हो जाता है |

Large Cap Mutual Funds शुरुआत में ज्यादा बेहतर रिटर्न नही दिखाती है लेकिन समय के साथ इसका रिटर्न भी धीरे-धीरे बढ़ते जाता है |


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क्या Small Cap Mutual Funds में ज्यादा रिटर्न मिलता है ? क्या आप जानना चाहते है कि स्माल कैप फण्ड में क्या खास है ? तो चलिए जानते है कि स्माल कैप फण्ड आखिर क्या है और क्या है खास?

Small Cap Mutual Funds in Hindi

Small Cap Funds in Hindi

वे फण्ड जो मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर छोटे कंपनियों में निवेश करते है, स्मालकैप Mutual Fund कहते है | स्माल कैप वह छोटे कम्पनियां होते है जो अपने डेवलपमेंट के चरण में होते है |

स्मालकैप फण्ड में रिस्क लार्ज कैप फण्ड की तुलना में अधिक होता है क्योकिं स्मालकैप फण्ड का पैसा स्टार्टअप या शुरुआत में कम कमाई करने वाले बिज़नस में लगाया जाता है |

स्मालकैप कंपनियां अपने डेवलपमेंट फेज में होती है इसलिए ऐसे कंपनियों में पैसा लगाने से स्मालकैप फण्ड के निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलता है | लेकिन स्मालकैप कंपनियां स्थायी नही होती है और न ही लार्ज कैप कंपनियों की तरह सफल होती है इसलिए इसमें (स्मालकैप फण्ड ) निवेश करने से रिस्क भी बहुत ज्यादा होता है |

स्मालकैप फण्ड उन निवेशकों के लिए बेहतर हो सकती है जो ज्यादा रिस्क लेने की क्षमता रखने के साथ-साथ लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्ट करना चाहते है क्योकि लम्बें समय में स्मालकैप Mutual Fund, मिड कैप व लार्ज कैप से ज्यादा रिटर्न दे सकता है |

स्मालकैप फण्ड शोर्ट टर्म में अच्छा रिटर्न नही देते है क्योकिं स्मालकैप कम्पनीयों में उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है और यह केवल निवेशकों के रिस्क को बढ़ाता है |

इसके अतिरिक्त बुल मार्केट के समय में स्मालकैप फण्ड का रिटर्न, मिड कैप व लार्ज कैप फण्ड से भी ज्यादा हो सकता है | जबकि बेयर मार्केट के समय में स्मालकैप फण्ड से निवेशकों को घाटा भी मिड कैप व लार्ज कैप से भी ज्यादा हो सकता है |

Small Cap Mutual Funds में निवेश से पहले क्या याद रखें ?

Small Cap Mutual Funds में निवेश करने से निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलता है लेकिन इसमें रिस्क भी बहुत ज्यादा होता है इसलिए निवेश से पहले स्मालकैप फण्ड का अच्छे से एनालिसिस करें और अगर आप रिस्क ले सकते है तब ही स्मालकैप फण्ड में निवेश करें अन्यथा न करें |
  • Small Cap Mutual Funds के रिस्क को कम करने के लिए अपने पोर्टफोलियो को डाईवर्सिफाई करे व फण्ड का रिसर्च करने में ज्यादा समय दे |
  • लम्बें समय के लिए निवेश करें ताकि बाजार के अस्थिरता से बच सकें |
  • बाजार की अस्थिरता से बचने के लिए फण्ड में सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिये भी निवेश कर सकते है |
  • अस्थायी कारणों से व बाजार के शोर्ट टर्म लाभ या हानि के कारण ही फण्ड की खरीदी-बिक्री न करें | 
  • मार्केट को टाइम करने व अनुमान लगाने की भूल कभी न करें |
  • स्मालकैप Mutual funds शोर्ट टर्म में बहुत अस्थिर रिटर्न देते है इसलिए लम्बे समय ( 5 साल से अधिक) के लक्ष्य के साथ निवेश करें |
  • स्मालकैप फण्ड में निवेश करने से पहले फण्ड के खर्च (एक्सपेंस रेश्यो ) को अवश्य जाँच करें |

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हाइब्रिड फण्ड क्या है | हाइब्रिड फण्ड के प्रकार | Hybrid Mutual Funds in Hindi

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जब आप म्यूच्यूअल फण्ड में इन्वेस्ट करते है तो क्या आपके मन में भी सवाल आता है कि आपको इक्विटी फण्ड मे इन्वेस्ट करना चाहिए या फिर डेट फण्ड में | तो चलिए आज समस्या का भी समाधान करते है और जानते है हाइब्रिड फण्ड के बारे में |
Hybrid Mutual Funds in Hindi

Hybrid Mutual Funds क्या है?

हाइब्रिड फण्ड, म्यूच्यूअल फण्ड निवेश का एक विकल्प है जो आपको डेट, इक्विटी व अन्य एसेट क्लास में निवेश करने की सुविधा देता है | इसमें न तो रिस्क ज्यादा होता है और न ही रिटर्न ज्यादा होता है मतलब हाइब्रिड फण्ड मीडियम रिस्क के साथ मीडियम रिटर्न देता है |

अगर आप इक्विटी फण्ड में निवेश करते है तो इसमें सही ज्ञान न होने से पैसे डूबने का जोखिम होता है व इसके साथ ज्यादा रिटर्न भी मिल सकता है जबकि डेट फण्ड में कम रिस्क होने के कारण रिटर्न भी कम होता है

हाइब्रिड म्यूच्यूअल फण्ड में इक्विटी व डेट दोनों एसेट में निवेश किया जाता है | इसका मतलब हाइब्रिड फण्ड डेट व इक्विटी एसेट का मिक्सचर होता है इसलिए hybrid mutual funds में इक्विटी फण्ड से कम रिस्क और डेट फण्ड से ज्यादा रिस्क होता है |

Hybrid Mutual Funds के प्रकार

इक्विटी या डेट में इन्वेस्ट करने के आधार पर हाइब्रिड फण्ड को कई केटेगरी में रखा गया है | ये केटेगरी म्यूच्यूअल फण्ड वर्गीकरण नॉर्म का अनुशरण करती है जो निम्नलिखित है |

Aggressive म्यूच्यूअल फण्ड - इसमें 15% से 35% फण्ड डेट इंस्ट्रूमेंट और शेष इक्विटी में निवेश किया जाता है इसलिए इस फण्ड में थोड़ा सा रिस्क होता है |

Balanced म्यूच्यूअल फण्ड - इस फण्ड में 40% से 60% के बीच का कॉम्बिनेशन रख कर लक्ष्य के आधार पर इक्विटी व डेट सिक्योरिटीज में निवेश किया जाता है |

Conservative म्यूच्यूअल फण्ड - इसमें केवल 10% से 25% पैसा ही इक्विटी में निवेश किया जाता है और शेष फण्ड डेट इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है ताकि निवेशकों का पैसा सुरक्षित रहे क्योकि इसमें बहुत ही कम रिस्क लेने वाले व्यक्ति निवेश करते है |

Dynamic एसेट एलोकेशन फण्ड - यह फण्ड फ्लेक्सिबल होता है मतलब किसी भी सिक्योरिटीज डेट या इक्विटी में निवेश करने का कोई फिक्स्ड स्ट्रक्चर नही होता है |

Equity सेविंग फंड्स - इस फण्ड का 65% भाग इक्विटी में लगाया जाता है और कम से कम 10% भाग डेट सिक्योरिटीज में एलोकेट किया जाता है |

Multi-एसेट एलोकेशन फण्ड - इस फण्ड में डेट, इक्विटी व अन्य एसेट क्लास में निवेश किया जाता है | इसमें सभी एसेट क्लास में कम से कम 10% एलोकेशन किया जाता है |

Arbitrage फण्ड - आर्बिट्राज फंड एक हाइब्रिड फण्ड होता है | इस फण्ड का 65% हिस्सा इक्विटी (कंपनियों के शेयर) या इक्विटी से जुड़े इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है | इसा फण्ड का पैसा इक्विटी में लगाये जाने के कारण रिस्क अधिक होता है इसलिए इसमें बेहतर रिटर्न मिलने की सम्भावना होता है |


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इक्विटी फण्ड क्या है | इक्विटी फण्ड के प्रकार | Equity Fund in Hindi

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म्यूच्यूअल फण्ड स्टॉक में इन्वेस्ट करने का इनडायरेक्ट तरीका होता है | इक्विटी फण्ड, म्यूच्यूअल फण्ड का एक विकल्प है | तो चलिए जानते है इक्विटी फण्ड क्या है और ये कितनें तरह के होते है ?

Equity Mutual Funds in Hindi

Equity Fund क्या है ?

इक्विटी फण्ड, म्यूच्यूअल फण्ड का एक विकल्प है | इसमें इन्वेस्ट किया गया पैसा कंपनियों के शेयर में लगाया जाता है इसलिए इसे इक्विटी फण्ड कहते है | जब एक फण्ड का 65% या उससे अधिक पैसा शेयरों में निवेश किया जाता है तो उसे इक्विटी फण्ड कहा जाता है | इसके शेष 35% या कम राशि को डेट सिक्योरिटीज या इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है |

इक्विटी फण्ड लॉन्ग टर्म में बेहतर रिटर्न देता है लेकिन इसमें रिस्क भी होता है क्योकिं इस फण्ड का पैसा शेयर बाजार में ट्रैड होने वाले शेयरों में इन्वेस्ट किया जाता है | इक्विटी फण्ड आपको 14% - 15% का औसत रिटर्न दे सकती है |

Equity Fund के प्रकार

म्यूच्यूअल फण्ड अलग-अलग प्रकार के होते है क्योकिं कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन कम या ज्यादा होता है | और ये कंपनियां विभिन्न सेक्टर या इंडस्ट्री की हो सकती है |

इसके साथ ही फण्ड हाउस या एसेट मैनेजमेंट कंपनियों के स्टाइल के आधार पर भी म्यूच्यूअल फण्ड कई प्रकार के हो सकते है |

स्माल कैप, मिड कैप, लार्ज कैप या मल्टी कैप

यहाँ कैप का मतलब मार्केट कैपिटलाइजेशन है | शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियां मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर छोटी-बड़ी होती है |

इस प्रकार जो फण्ड ज्यादा मार्केट कैप वाले अच्छी कंपनियों में पैसा लगाती है उसे लार्ज कैप फण्ड कहते है | इसमें बाजार का उतार-चढाव थोड़ा कम होता है |

वहीं जो फण्ड मीडियम कैप व स्मालकैप वाले कंपनियों में पैसा लगाती है उसे क्रमशः मिड कैप व स्मालकैप फण्ड कहते है | इन फण्ड में बाज़ार के ऊपर-नीचें होने पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है |

सेक्टर फण्ड, डाइवर्सिफाइड फण्ड और थीमेटिक फण्ड

सेक्टर फण्ड का पैसा एक ही सेक्टर के कई कंपनियों में निवेश किया जाता है | जैसे आईटी, बैंकिंग, रिटेल, एग्रीकल्चर सेक्टर आदि | इसमें एक ही सेक्टर में इन्वेस्ट होने से निवेशक को जोखिम भी ज्यादा होता है |

जबकि डाइवर्सिफाइड फण्ड में लगाया पैसा अलग-अलग सेक्टर के कंपनियों में इन्वेस्ट किया जाता है इसलिए इसमें जोखिम सेक्टर फण्ड की तुलना में कम हो जाता है |

थीमेटिक फण्ड का पैसा एक थीम को फॉलो करके लगाया जाता है | जैसे स्टार्टअप आदि |

एक्टिव फण्ड और पैसिव फण्ड

ये फण्ड पूरी तरह से फण्ड हाउस व फण्ड मैनेजर के इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी पर निर्भर करता है | अगर फण्ड मैनेजर कंपनियों का एनालिसिस व रिसर्च करके उसे अपने पोर्टफोलियो में रखता है तो ऐसे फण्ड को एक्टिव फण्ड कहते है |

जबकि पैसिव फण्ड उसे कहते है जिसमे फण्ड मैनेजर इंडेक्स ( सेंसेक्स व निफ्टी आदि) के कंपनियों में निवेश करता है जिससे इसका रिटर्न भी इंडेक्स के समान ही आता है इसलिए इस फण्ड को इंडेक्स फण्ड भी कहते है|

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डेट फण्ड क्या है | डेट फण्ड के प्रकार | What are Debt Mutual Funds in Hindi

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क्या आप म्यूच्यूअल फण्ड में इन्वेस्ट करना चाहतें है लेकिन ज्यादा रिस्क लेने से डरते है ? अगर हाँ तो आप बिल्कुल सही पोस्ट पढ़ रहे है | आज के इस पोस्ट में आप डेट फण्ड के बारे में सीखने वाले है | तो चलिए जानतें है Debt Mutual funds क्या होता है |

Debt Mutual Funds in Hindi

Debt Mutual Funds क्या है ?

डेट फण्ड, म्यूच्यूअल फण्ड का एक विकल्प है | यह उन निवेशकों के लिए बेहतर है जो कम रिस्क लेकर अपनें पैसे को निवेश करना चाहते है | डेट फण्ड में निवेशकों के लगायें पैसे को सरकारी प्रतिभूतियों, कॉर्पोरेट बांड, ट्रेज़री बिल, व अन्य प्रकार के सिक्योरिटीज़ में लगाया जाता है अर्थात् उधार के रूप में संस्थाओ को दिया जाता है|

डेट फण्ड में इक्विटी फण्ड के तुलना में रिस्क कम होता है | इक्विटी फण्ड में पैसा कंपनियों के शेयर में लगाया जाता है इसलिए इक्विटी फण्ड में रिस्क ज्यादा होता है |

डेब्ट फण्ड में लगाया गया पैसा एक निश्चित समय के लिए, निश्चित ब्याज़ दर पर लगाया जाता है | अतः निवेशकों को इस बात का खबर रहता है कि समयावधि समाप्त होने पर उन्हें एक "फिक्स इनकम" मिलने वाला है | डेट फण्ड को फिक्स इनकम मिलने के वजह से ही फिक्स इनकम सिक्यूरिटी कहा जाता है |

डेट फण्ड में लगाया पैसा कम या ज्यादा समय के लिए अलग-अलग क्रेडिट रेटिंग्स की सिक्योरिटीज़ में भी लगाया जाता है ताकि निवेशकों को बेहतर रिटर्न दिलाया जा सकें, परंतु कई बार क्रेडिट रेटिंग्स के आधार पर इन सिक्योरिटीज़ में रिस्क भी होते है | जहां ज्यादा क्रेडिट रेटिंग वालें संस्थाओ अपना उधारी व ब्याज़ चुकाने में बेहतर मानी जाती है |

आप डेट फण्ड में कम समय (3 या 6 माह ) या लम्बे समय के (3 या 5 साल से अधिक ) के लिए इन्वेस्ट कर सकते है | समय ( मैच्योरिटी) के आधार पर डेट फण्ड भी अलग-अलग हो सकते है |

डेट फण्ड में 3 साल या उससे ज्यादा होने के बाद 20% का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगाया जाता है जबकि शोर्ट-टर्म में निवेशक को डेट फण्ड से मिलने वाले कैपिटल गेन को टोटल इनकम में जोड़कर सरकार द्वारा निर्धारित टैक्स स्लैब के आधार पर टैक्स देना होता है |

Debt Mutual Funds कैसे करता है ?

इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड कंपनियों के शेयर पर निर्भर होता है उसी प्रकार डेट म्यूच्यूअल फण्ड पूरी तरह से ब्याज़ दर पर निर्भर करता है |

ब्याज़ दर (रेपो रेट व रिवर्स रेपो ), जिसे रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) नियंत्रित करती है अर्थात RBI ही ब्याजदर को अर्थव्यवस्था के परिस्थितियों के आधार पर कम या ज्यादा करती है |

और इस ब्याजदर के उतार-चढाव के आधार पर ही कॉर्पोरेट बांड या डेट सिक्योरिटीज जारी करती है | इसका मतलब है कि डेट फण्ड का रिटर्न ब्याजदर पर निर्भर होता है |

अगर ब्याजदर कम होता है तो बांड की कीमत बढ़ जाती है और निवेशकों को अच्छा रिटर्न मिलता है जबकि ब्याजदर ज्यादा होता है तो बांड की कीमत घट जाती है | इसका मतलब डेट इंस्ट्रूमेंट का की कीमत ब्याजदर के विपरीत होता है |

Debt Mutual Fund के प्रकार

जिस तरह इक्विटी फण्ड, मार्केट कैप व इन्वेस्टिंग स्टाइल के आधार कई प्रकार के होते है उसी प्रकार डेट फण्ड मैच्योरिटी के समय के आधार पर कई प्रकार के होते है |

लिक्विड फण्ड - इस फण्ड का पैसा ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट में लगाया जाता है जिन की मैच्योरिटी 91 दिन से ज्यादा नही होती है | यह फण्ड बचत बैंक की तुलना में अच्छा विकल्प होता है क्योकिं इसमें बेहतर रिटर्न मिलता है और कम समय के लिए होता है |

लिक्विड फण्ड का पैसा कम समय में मैच्योर होने वाले डेट इंस्ट्रूमेंट में लगया जाता है इसलिए इसमें रिस्क कम होता है व रिटर्न के नेगेटिव होने का चान्स बहुत ही कम होता है |

डायनामिक फण्ड - डायनामिक फण्ड में, निवेश में मिलने वाला ब्याज़ दर बदलता रहता है इसलिए निवेश के मैच्योर होने का समय भी बदलता रहता है अर्थात ब्याज दर से सीधा सम्बन्ध होने के कारण पैसे का निवेश भी जल्दी या देर से किया जाता है |

शोर्ट टर्म या अल्ट्रा शोर्ट टर्म डेट फण्ड - ये डेट फंड्स ऐसे इन्वेस्टर के लिए बहुत ही उपयुक्त है जो 3 साल के लिए निवेश करना चाहते है क्योकिं यह फण्ड 3 साल में मैच्योर हो जाते है | इसके साथ ही ब्याज़ दर में बदलाव का भी इन फंड्स में ज्यादा प्रभाव नही होता है |

इनकम फण्ड - इनकम फण्ड में मैच्योरिटी का समय कम से कम 5 औसतन होता है इसलिए इस फण्ड का पैसा ब्याज़ दर के आधार पर अलग-अलग सिक्योरिटीज़ में लगाया जाता है ताकि निवेशकों को बेहतर रिटर्न दिलाया जा सकें |

गिल्ट फण्ड - इस फण्ड का पैसा केवल सरकारी सिक्योरिटीज में इन्वेस्ट किया जाता है | गिल्ट फण्ड उन निवेशकों के लिए बेहतर माना जाता है जो कम रिस्क के साथ एक अच्छे विकल्प की तलाश में है | गिल्ट फण्ड में क्रेडिट रिस्क कम होता है क्योकिं गिल्ट फण्ड का पैसा सरकारी सिक्योरिटीज में लगाया जाता है |

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मुद्रास्फीति क्या है | महंगाई कैसे बढ़ती है | What is Inflation Meaning in Hindi

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What is Inflation Meaning in Hindi:क्या मुद्रास्फीति के कारण दैनिक आवश्यकताओं की चीजें महंगी हो जाती है ? क्या मुद्रास्फीति का प्रभाव हम सब पर पड़ता है ? यदि हाँ तो मुद्रास्फीति या महंगाई से बचने के क्या तरीके है ? चलिए जानते है आखिर क्यों मुद्रास्फीति अच्छी नही होती है ?

What is Inflation Meaning in Hindi

मुद्रास्फीति या Inflation क्या है ?

मुद्रास्फीति एक ऐसी स्थिति है जिसमें जिस मुद्रा (रुपयें ) से आप सामान खरीदते है उसकी वैल्यू कम हो जाती है क्योकिं देश में ज्यादा मुद्रा (सिक्के व नोट की संख्या ) हो जाते है | और वस्तुओं (खानें-पीने, दैनिक उपयोग व अन्य सामान ) की कीमत बढ़ जाती है |

इस तरह से महंगाई (मुद्रास्फीति ) में रुपयें सभी के पास आ जाते है | जिसकी वजह से मुद्रा से खरीदनें की शक्ति कम हो जाती है और उपयोग की वस्तुयें कम हो जाती है जिससे वस्तुओं की कीमत आसमान छूने लगती है |

मुद्रास्फीति के समय भी देश में मुद्रा (रुपयें ) का चलन तो पहले जैसा ही होते रहता है लेकिन इस तरह मुद्रा की वैल्यू घटने पर भी प्रभाव दिखाई नही देता है |

इसका सबसे ज्यादा प्रभाव कम इनकम वाले एवं मध्यमवर्गीय परिवार पर होता है क्योकिं महंगाई बढ़ने के कारण ऐसे परिवार अपनी दैनिक उपयोग के वस्तुओं(खानें-पीने, दैनिक उपयोग के अन्य सामान ) को भी खरीद नही पाते है |

याद करिये आज से 10 साल पहले 100 रुपयें में आप बहुत सा सामान खरीद कर ले आते थे लेकिन आज 100 रुपयें में केवल एक या दो सामान ही मिलती है | इसकी मुख्य वजह मुद्रास्फीति (महंगाई) है |

उदाहरण: आज एक कुर्सी 100 रुपयें  में मिलता है और आप 100 रुपयें  बैंक में जमा करते है | एक साल बाद कुर्सी  की कीमत 106 (100 + 6 महंगाई) रुपयें हो जाती है लेकिन आपके बैंक में जमा 104 (100+ 4 ब्याज ) रुपयें होते है मतलब आपके 100 रुपयें में खरीदनें की शक्ति 2 प्रतिशत कम हो गयी है |

मुद्रास्फीति हर साल 5% - 6% की दर से बढ़ती है मतलब हर साल मुद्रा ( रूपये ) से खरीदनें की शक्ति 5-6 प्रतिशत कम होते जाती है इसलिए मुद्रा (रुपयें ) के खरीदनें की शक्ति को बढ़ाना जरुरी हो जाता है |

महंगाई या मुद्रास्फीति (inflation) से कैसे बचें?

मुद्रास्फीति या महंगाई से बचने का केवल एक ही तरीका है | इससे बचनें के लिए आपको मुद्रा (रुपयें) की वैल्यू को बढ़ाना है | मुद्रा (रुपयें) की वैल्यू बढ़ाने के लिए आपको मुद्रा (रुपयें) को सही से उपयोग में लाना है |
  • मुद्रा की बचत करना 
  • मुद्रा की बचत कर बैंक में न रखना क्योकिं बैंक में 4% ब्याज मिलता है जो महंगाई दर (6%) से कम है
  • बचत करने के बाद मुद्रा का निवेश करना ताकि महंगाई दर से ज्यादा का ब्याज ( रिटर्न ) मिल सके
नोट: निवेश का अर्थ = किसी ऐसे जगह में मुद्रा(रूपये) को लगाना जिसमें रिस्क या जोखिम कम हो और जिससे महंगाई दर (6%) से ज्यादा का ब्याज ( रिटर्न ) मिल सकें |

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क्या आप टैक्स बचाने के साथ-साथ अपने निवेश में अच्छा रिटर्न भी कमाना चाहते है ? और क्या यह संभव है ?तो चलिए जानतें है यह कैसे संभव है व ELSS क्या है और इसके क्या-क्या फायदे है ?
ELSS in Hindi

Equity Linked Savings Scheme या ELSS क्या है?

ईएलएलएस या इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम के नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ईएलएलएस एक टैक्स सेविंग स्कीम है | अर्थात् ईएलएलएस में पैसे लगाकर आप सेक्शन 80सी के तहत 1.5 लाख रुपयें तक के निवेश में टैक्स छूट का फायदा उठा सकतें है |

ईएलएलएस एक इक्विटी फण्ड होता है | अगर आप ELSS में पैसा लगाते है तो यह पैसा इनडायरेक्ट रूप से इक्विटी या शेयर में लगाया जाता है अर्थात् आप ईएलएलएस में पैसा लगाकर टैक्स में छुट व ज्यादा रिटर्न कमा सकतें है |

Equity Linked Savings Scheme में लगाया गया पैसा 3 साल के लिए लॉक हो जाता है मतलब ईएलएलएस का लॉक इन पीरियड 3 साल का होता है | ईएलएलएस ही एक ऐसा टैक्स सेविंग स्कीम है जिसका लॉक इन पीरियड अन्य टैक्स सेविंग स्कीम की तुलना में बहुत कम है |

पीपीएफ (पब्लिक प्रोविडेंट फण्ड ) का लॉक इन पीरियड 15 साल है, जबकि एफडी (फिक्स्ड डिपाजिट ) का 5 साल लॉक इन पीरियड है | जो ELSS के लॉक इन पीरियड से ज्यादा है | इसके साथ ही ELSS में रिटर्न भी अन्य स्कीमों की तुलना में बेहतर होता है |

यह लॉन्ग टर्म में इन्वेस्ट कर संपत्ति बनाने का बेहतर विकल्प कहा जा सकता है | इसके अतिरिक्त ईएलएलएस के निवेश से मिलने वाला रिटर्न 1 लाख रुपयें से ज्यादा होने पर 10% लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लिया जाता है |

क्या ELSS में निवेश करना सही है?

ईएलएलएस या इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में रिटर्न व रिस्क अधिक होता है क्योकिं इसमें इन्वेस्ट किया गया पैसा इक्विटी मतलब कंपनियों के शेयर में लगाया जाता है | अतः केवल टैक्स सेविंग के लिए ही ELSS में इन्वेस्ट न करें|

अगर आप स्टॉक या शेयर के उतार-चढ़ाव के रिस्क को संभाल सकते है तभी आपको ईएलएलएस में पैसे लगाने चाहिये, अन्यथा ELSS आपके लिए सही नही है |

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ETF का फुल नाम Exchange Traded Fund (एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड) होता है | मगर ETF क्या है ? और ये म्यूच्यूअल फण्ड से अलग क्यों है ? और ETF के क्या-क्या फायदे होते है ?
Exchange Traded Fund (ETF) in Hindi

Exchange Traded Fund(ETF)  in Hindi

एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड को अगर अलग-अलग समझते है तो एक्सचेंज का अर्थ स्टॉक एक्सचेंज, ट्रेडेड का अर्थ खरीदने-बेचने वाला, फण्ड मतलब बहुत से इन्वेस्टर्स का पैसा |

इस तरह से ETF या एक्सचेंज ट्रेडेड फण्ड का मतलब स्टॉक एक्सचेंज में हर दिन बाजार के निर्धारित समय में ख़रीदा व बेचा जाने वाला फण्ड है | ETF अलग-अलग सिक्योरिटीज़ ( शेयर, बांड, कमोडिटी, मुद्रा आदि) के आधार पर कई प्रकार के हो सकते है | इनमें से कुछ नीचें दिए गये है |

Exchange Traded Fund के प्रकार

गोल्ड ETF- गोल्ड ETF का प्राइस सोने के प्राइस पर बेस्ड होता है जब गोल्ड का प्राइस ऊपर जाता है तो गोल्ड ETF का प्राइस भी ऊपर जाता है और गोल्ड के दाम नीचें जाता है तो ETF का प्राइस भी नीचें चला जाता है |

करेंसी ETF- यह ETF आपको किसी देश के करेंसी को खरीदें बिना ही करेंसी मार्केट में भाग लेने का मौका देता है |

इंडेक्स फण्ड ETF- यह ETF एक पैसिव म्यूच्यूअल फण्ड की तरह होता है | जब कोई इन्वेस्टर इंडेक्स फण्ड या इंडेक्स फण्ड ETF खरीदता है तो वह इंडेक्स (सेंसेक्स, निफ्टी आदि ) के अंतर्गत आने वाले स्टॉक या शेयर के एक पोर्टफोलियो को खरीदता है |

ETF या Exchange Traded Fund के क्या फायदे है ?

  • इसका एक्सपेंस रेश्यो अन्य फण्ड की तुलना में कम होता है
  • यह मार्केट ओपन होने के बाद आसानी से ख़रीदा व बेचा जा सकता है 
  • यह डाइवर्सिफाइड होता है तो रिस्क भी कम हो जाता है
  • टैक्स लाभ के लिए भी ETF सही होता है
  • इसमें रिटर्न भी शेयर के इंडेक्स की तरह मिलता है

Exchange Traded Fund और Mutual Fund में अंतर

ETF व म्यूच्यूअल फण्ड दोनों में अंतर होता है | ETF के मूल्य में बदलाव रियल टाइम में होता है जबकि म्यूच्यूअल फण्ड NAV के मूल्य में परिवर्तन दिन के अंत में होता है |

ETF को म्यूच्यूअल फण्ड के एनएफओ की तरह ही एसेट मैनेजमेंट कम्पनी पेश करती है उसके बाद ETF शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिए लिस्ट किया जाता है |

एक निवेशक ETF को रियल टाइम मूल्य में खरीद-बेच सकता है मतलब ETF का ट्रेडिंग किया जा सकता है जबकि म्यूच्यूअल फण्ड में ट्रेडिंग संभव नही है |

ETF को खरीदनें- बेचने के लिए डीमैट अकाउंट होना जरुरी है पर म्यूच्यूअल फण्ड खरीदनें के लिए डीमैट अकाउंट होना जरुरी नही है |

इसके अतिरिक्त ETF में एक्सपेंस रेश्यो (फण्ड का खर्च ) भी म्यूच्यूअल फण्ड की तुलना में कम होता है |

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क्या है इंडेक्स फण्ड | क्या आपको निवेश करना चाहिए | Index Funds in Hindi

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म्यूच्यूअल फण्ड निवेश का बेहतर विकल्प है | बाजार में म्यूच्यूअल फण्ड के कई विकल्प निवेश करने के लिए उपलब्ध है | इंडेक्स फण्ड भी उन्ही विकल्पों में से एक है | पर इंडेक्स फण्ड के बारे में बहुत कम लोगों को पता होता है |
Index Funds in Hindi

Index Funds क्या है?

Index Fund एक इक्विटी म्यूच्यूअल फण्ड है | जैसा कि इसके नाम में इंडेक्स है इसका मतलब यह है कि इंडेक्स फण्ड में लगाया गया पैसा शेयर बाजार के इंडेक्स में लगाया जाता है |

Index fund एक पैसिव फण्ड होता है अर्थात इसमें अनुभवी फण्ड मैनेजरों के द्वारा शेयर नही चुना जाता है | बल्कि इंडेक्स के कंपनियों में निवेश किया जाता है |

भारतीय शेयर बाजार में दो मुख्य इंडेक्स सेंसेक्स व निफ्टी के साथ कई इंडेक्स है अतः इंडेक्स फण्ड का पैसा सेंसेक्स के 30 कंपनिया या निफ्टी के 50 कंपनियों में या अन्य सेक्टरों के इंडेक्स में लगाया जाता है |

इसके अतिरिक्त इंडेक्स फण्ड में एक्टिव फण्ड (जिसमे फण्ड मेनेजर की आवश्यकता होती है ) की तुलना में एक्सपेंस रेश्यो ( फण्ड का खर्च ) कम होता है |

भारत जैसे उभरते देशों में इंडेक्स फण्ड में निवेश कम किया जाता है क्योकिं भारत जैसे बाजारों में अच्छे शेयर चुनकर फायदा लिया जा सकता है | इसलिए ज्यादातर सलाहकार एक्टिव फण्ड को ही चुनने की सलाह देते है |

Index fund का सीधा सम्बन्ध स्टॉक मार्केट से होता है इसलिए शेयर बाजार के गिरने पर इंडेक्स फण्ड का रिटर्न कम हो जाता है | इंडेक्स फण्ड से लॉन्ग टर्म में 15% से 16% का एवेरज रिटर्न प्राप्त किया जा सकता है |

इंडेक्स फण्ड उन इन्वेस्टर के लिए अच्छा होता है जो शेयर में इन्वेस्ट करना चाहते है लेकिन शेयर बाजार को ट्रैक नही कर पाते है | इसलिए वे इंडेक्स फण्ड में लगाकर लॉन्ग टर्म के लिए छोड़ देते है |

इंडेक्स फण्ड में निवेश आप उसी प्रकार कर सकते है | जैसे आप एक अन्य म्यूच्यूअल फण्ड में करते है |  फण्ड हाउस के ऑफिस में जाकर, ऑनलाइन या डिस्ट्रीब्यूटर के माध्यम से आप इंडेक्स फण्ड में निवेश कर सकते है|

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म्यूच्यूअल फण्ड निवेश की बात की जाती है तो उसमें म्यूच्यूअल फण्ड NFO के बारे में चर्चा जरुर होती है | तो चलिए जानतें है आखिर म्यूच्यूअल फण्ड NFO क्या है और इसे जानना क्यों जरुरी है ?
Mutual Fund NFO in Hindi

Mutual Funds NFO क्या है?

जब भी कोई AMC ( एसेट मैनेजमेंट कंपनी ) कोई नया फण्ड स्कीम लाती है तो उसे NFO कहा जाता है | NFO का फुल फॉर्म New Fund Offer (न्यू फण्ड ऑफर ) है |

जब कोई AMC म्यूच्यूअल फण्ड NFO लाती है तो इसका उद्देश्य निवेशकों से पैसा जुटाना होता है ताकि शेयर्स या सरकारी बांड आदि में लगाया जा सकें |

एसेट मैनेजमेंट कंपनी NFO (न्यू फण्ड ऑफर) एक निश्चत समय के लिए या किसी भी समय निवेश करने के लिए ला सकती है अर्थात् Mutual Fund NFO क्लोज एंडेड या ओपन एंडेड हो सकते है |

कई AMC ( एसेट मैनेजमेंट कंपनी ) ऐसी भी होती है जो न्यू फण्ड ऑफर केवल इसलिए लाती है ताकि उनकें पास सभी प्रकार के फण्ड स्कीम हो सकें | उदाहरण के लिए अगर XYZ एसेट मैनेजमेंट कंपनी के पास लार्ज कैप फण्ड व स्मालकैप फण्ड है तो ऐसे में वो कंपनी अपना मिडकैप फण्ड भी NFO के जरिये ला सकती है |

अक्सर ऐसी कंपनियां (AMC) पब्लिक से ज्यादा से ज्यादा पैसा जुटाने के लिए NFO (न्यू फण्ड ऑफर) का जोरदार और जोरशोर से प्रचार प्रसार करती है ताकि अधिक से अधिक निवेशक उस कम्पनी के NFO में निवेश करें |

क्या Mutual Fund NFO में पैसा लगाना चाहिए?

इसके जवाब में मेरा एक ही सवाल है | Mutual Fund NFO में पैसा क्यों लगाना चाहिए ? क्या आपको NFO में केवल इसलिए इन्वेस्ट कर देना चाहिए क्योकिं आपको म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट 10 रुपयें में मिल रहे है |

 आपको NFO में पैसा बिल्कुल भी नहीं लगाना चाहिए क्योकिं मार्केट में इतनें सारे स्कीम या फण्ड पहले से उपलब्ध है | जिनके फण्ड, फण्ड मैनेजर व पोर्टफोलियो के परफॉर्मेंस का ट्रैक रिकार्ड भी उपलब्ध है लेकिन NFO या नये फण्ड में आपको इसकी कोई जानकारी नही होती है |

और यदि आपको अपने पोर्टफोलियो को बेहतर करने के लिए न्यू स्कीम की जरुरत है तब भी आपको NFO को बहुत ही ध्यानपूर्वक चुनाव करना चाहिए |

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अगर आप म्यूच्यूअल फण्ड में इन्वेस्ट करते है या आप म्यूच्यूअल फण्ड में इन्वेस्ट करने का प्लान बना रहे है तो Mutual fund NAV को जानना बहुत ही आवश्यक है | तो आइये म्यूच्यूअल फण्ड NAV से जुड़ीं सारी बातों को जानतें है |
Mutual Fund NAV in Hindi

Mutual Fund NAV क्या है?

Mutual Fund NAV का मतलब नेट एसेट वैल्यू होता है | इसे आप म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट का प्राइस या दाम भी कह सकते है |

जब आप म्यूच्यूअल फण्ड खरीदते है तो आपको इन्वेस्ट किये गये पैसे के लिए Mutual फण्ड यूनिट दिया है और इसके प्रति यूनिट के दाम को ही NAV कहा जाता है |

Mutual Fund NAV का प्राइस या दाम घटता-बढ़ता रहता है | और इस उतार-चढाव के कारण ही म्यूच्यूअल फण्ड इन्वेस्टर को फायदा या नुकसान होता है | मतलब mutual fund NAV से आपके इन्वेस्टमेंट में कितना रिटर्न आया है इसका पता लगाया जाता है |



म्यूच्यूअल फण्ड NAV का उतार चढाव शेयर बाजार और डेट मार्केट आदि पर निर्भर करता है | अर्थात इन सिक्योरिटीज़ या साधन के दाम घटने या बढ़ने का सीधा संबध Mutual fund NAV से होता है | यानि कि म्यूच्यूअल फण्ड NAV भी घटता-बढ़ता है |

Mutual Fund NAV कैसे काम करता है ?

मान लीजिये एक फण्ड में NAV का प्राइस 50 रूपये है और आप 5000 रूपयें निवेश करतें है तो आपको 5000/50 =  100 म्यूच्यूअल फण्ड यूनिट मिलते है |

मान लीजिये एक साल बाद Mutual Fund NAV का प्राइस 60 रूपयें हो जाता है | इसका मतलब NAV में 20%
का ग्रोथ हुआ है | और अगर आप इसे 60 रुपयें के NAV में ही बेच देते है तो आपको 60 X 100 यूनिट = 6000 रुपयें मिलते है |

नोट: जब आप किसी म्यूच्यूअल फण्ड को बेचते है या रिडीम करते है तो आपको एग्जिट लोड के रूप में फीस देना होता है | जो 1% या एक फीसदी होती है |

मतलब जब आप म्यूच्यूअल फण्ड से बाहर निकलते है तो आपको  60 x 100 यूनिट - 1% एग्जिट लोड ( इस उदाहारण में 60 रूपये) = 5940 रूपयें मिलते है |

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